कुरान - 25:31 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

31
وَكَذَٰلِكَ جَعَلۡنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوّٗا مِّنَ ٱلۡمُجۡرِمِينَۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيٗا وَنَصِيرٗا

Transliteration: (Wa kazaalika ja'alnaa likulli Nabiyyin 'aduwwan minal mujrimeen; wa kafaa bi Rabbika haadiyanw wa naseeraa)

और इसी तरह हमने हर नबी के लिए मुजरिमों में से कुछ दुश्मन बनाए हैं [58]; और आपका रब हिदायत देने और मदद करने के लिए काफ़ी है [59]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 31 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 31

"और इसी तरह हमने हर नबी के लिए मुजरिमों में से दुश्मन बनाए [58]; और आपका रब हिदायत व मदद के लिए काफ़ी है [59]!"

[58] अंबिया-ए-किराम के मुक़ाबले में मुजरिमों की दुश्मनी

अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को तसल्ली देते हुए फ़रमाया कि ऐ महबूब! अगर क़ुरैश के सरकश मुजरिम आपकी मुख़ालिफ़त कर रहे हैं तो रंजीदा न हों। हर ज़माने में हर नबी के मुक़ाबले में बदकार और मुजरिम लोग दुश्मनी पर उतरते रहे हैं। यह हक़ व बातिल की पुरानी जंग है।

[59] अल्लाह की हिदायत और नुसरत की किफ़ायत

अल्लाह तआला अपने नबियों और उनके सच्चे पैरोकारों की मदद और हिदायत के लिए काफ़ी है। दुश्मनों की तमाम साज़िशें ख़ाक में मिल जाएंगी और अल्लाह का दीन ही ग़ालिब रहेगा।

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