Transliteration: (Wa izaa ra awka iny yattakhizoonaka illaa huzuwan ahaazal lazee ba'asal laahu Rasoolaa)
"और जब वे आपको देखते हैं, तो आपका सिर्फ़ मज़ाक़ उड़ाते हैं [74] कि 'क्या यही वह शख़्स हैं जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है [75]?'"
जब कुफ़्फ़ार-ए-मक्का रसूलुल्लाह ﷺ को देखते, तो अपनी हिक़ारत और तकब्बुर की बिना पर उँगलियाँ उठाते और तंज़ करते। वे नबी-ए-रहमत ﷺ की रूहानी अज़मत, पाकीज़ा किरदार और मोजिज़ात से आँखें चुराकर महज़ दुनियावी माद्दिपरस्ती के तराज़ू में आपको तोलते थे।
काफ़िर तअज्जुब और नफ़रत से कहते कि क्या मक्का और ताइफ़ के बड़े-बड़े मालदारों और सरदारों को छोड़कर अल्लाह ने इस यतीम और सादा ज़िन्दगी बसर करने वाले को रसूल बना दिया? यह उनके दिल की जलन और हिकमत-ए-इलाही के ख़िलाफ़ बगावत थी, क्योंकि अल्लाह ख़ूब जानता है कि रिसालत का अज़ीम बोझ उठाने का अहल कौन है।
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