कुरान - 25:40 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
وَلَقَدۡ أَتَوۡاْ عَلَى ٱلۡقَرۡيَةِ ٱلَّتِيٓ أُمۡطِرَتۡ مَطَرَ ٱلسَّوۡءِۚ أَفَلَمۡ يَكُونُواْ يَرَوۡنَهَاۚ بَلۡ كَانُواْ لَا يَرۡجُونَ نُشُورٗا

Transliteration: (Wa laqad ataw 'alal qaryatil lateee umtirat mataras saw'; afalam yakoonoo yarawnahaa; bal kaanoo laa yarjoona nushooraa)

और यक़ीनन ये लोग (कुरैश) उस बस्ती के पास से बार-बार गुज़रे हैं जिस पर बुरी (पत्थरों की) बारिश बरसाई गई थी [73]; तो क्या वे उसे देखते नहीं थे? बल्कि बात यह है कि वे दोबारा ज़िन्दा किए जाने की कोई उम्मीद ही नहीं रखते थे [74]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 40

"और यक़ीनन ये उस बस्ती के पास से गुज़रे हैं जिस पर बुरी बारिश बरसाई गई थी [73]; क्या देखते नहीं थे? बल्कि वे दोबारा उठने की उम्मीद ही नहीं रखते थे [74]!"

[73] सदूम की बस्ती और पत्थरों की बारिश (क़ौम-ए-लूत)

यहाँ हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम की बस्तियों (सदूम व अमोरा) का ज़िक्र है, जिन पर अल्लाह ने गंधक और आग के पत्थरों की बारिश बरसाई और बस्तियों को उलट-पुलट कर दिया। कुरैश के तिजारती क़ाफ़िले मुल्क-ए-शाम जाते हुए बहर-ए-मुर्दार (Dead Sea) के किनारे इन वीरान खंडहरों के पास से बार-बार गुज़रते थे।

[74] बसीरत की महरूमी और इंकार-ए-आख़िरत

कुरैश इन खंडहरों को अपनी आँखों से देखते थे, मगर इससे कोई सबक़ या इब्रत हासिल नहीं करते थे। इसकी वजह यह थी कि उनके दिलों में क़ियामत के दिन दोबारा ज़िन्दा होने और ख़ुदा के सामने पेश होने का कोई ख़ौफ़ या यक़ीन ही न था।

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