कुरान - 25:42 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنۡ ءَالِهَتِنَا لَوۡلَآ أَن صَبَرۡنَا عَلَيۡهَاۚ وَسَوۡفَ يَعۡلَمُونَ حِينَ يَرَوۡنَ ٱلۡعَذَابَ مَنۡ أَضَلُّ سَبِيلًا

Transliteration: (In kaada la yudillunaa 'an aalihatinaa law laaa an sabarnaa 'alaihaa; wa sawfa ya'lamoona heena yarawnal 'azaaba man adallu sabeela)

इन्होंने तो हमें हमारे माबूदों से भटका ही दिया होता अगर हम उन पर मजबूती से जमे न रहते [76]!' और वे बहुत जल्द जान लेंगे, जब अज़ाब को देखेंगे, कि कौन रास्ते से ज़्यादा भटका हुआ था [77]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 42

"'इन्होंने तो हमें हमारे माबूदों से भटका दिया होता अगर हम जमे न रहते [76]!' और जब अज़ाब देखेंगे तो जान लेंगे कि कौन ज़्यादा भटका हुआ था [77]!"

[76] बातिल माबूदों पर मुशरिकीन की ज़िद और फ़ख़्र

काफ़िर आपस में कहते थे कि मुहम्मद ﷺ के कलाम (क़ुरआन) में ऐसा तास्सिर और असरअंगेज़ी है कि क़रीब था कि वे हमें हमारे बाप-दादा के बुतों से फेर देते, लेकिन यह तो हमारा कमाल और सब्र था कि हम अपने लात व उज़्ज़ा पर जमे रहे। वे गुमराही पर जमे रहने को फ़ख़्र समझते थे।

[77] अज़ाब के वक़्त हक़ीक़त का खुलना

अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि आज ये तकब्बुर से अहले-ईमान को गुमराह कहते हैं, लेकिन जब आख़िरत में जहन्नम का ख़ौफ़नाक अज़ाब अपनी आँखों से देख लेंगे, तब इन्हें अच्छी तरह मालूम हो जाएगा कि अस्ल गुमराह और बदबख़्त कौन था।

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