कुरान - 25:43 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
أَرَءَيۡتَ مَنِ ٱتَّخَذَ إِلَٰهَهُۥ هَوَىٰهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيۡهِ وَكِيلًا

Transliteration: (Ara'aita manit takhaza ilaahahoo hawaahu afa anta takoonu 'alaihi wakeelaa)

क्या आपने उस शख़्स को देखा जिसने अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिश को अपना माबूद बना लिया है [78]? तो क्या आप उस पर निगहबान (ज़िम्मेदार) बन सकते हैं [79]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 43

"क्या आपने उसे देखा जिसने ख़्वाहिश-ए-नफ़्स को अपना माबूद बना लिया [78]? तो क्या आप उस पर निगहबान बन सकते हैं [79]?"

[78] नफ़्सानी ख़्वाहिशात की परस्तिश

मुशरिकीन की आदत थी कि अगर उन्हें कोई ख़ूबसूरत पत्थर नज़र आता तो पुराने बुत को फेंक कर नए पत्थर की पूजा करने लगते थे। इसी तरह जो शख़्स अल्लाह के हुक्म और अक़्ल-ए-सलीम को छोड़कर अपने नफ़्स की ख़्वाहिशात, मर्ज़ी और लज़्ज़तों का ग़ुलाम बन जाए, वह गोया अपने नफ़्स को माबूद बना चुका है। नफ़्स-परस्ती शिर्क की एक ख़फ़ी (छुपी हुई) क़िस्म है।

[79] रसूलुल्लाह ﷺ की ज़िम्मेदारी की हद

अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ से फ़रमाया कि जो इंसान अपनी बद-बख़्ती से नफ़्स का बंदा बन चुका हो, आप उसके ईमान लाने के ज़िम्मेदार या वकील नहीं हैं। आपका काम सिर्फ़ हक़ पहुंचा देना है, किसी को ज़बरदस्ती मोमिन बनाना आपकी ज़िम्मेदारी नहीं।

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