Transliteration: (Ara'aita manit takhaza ilaahahoo hawaahu afa anta takoonu 'alaihi wakeelaa)
"क्या आपने उसे देखा जिसने ख़्वाहिश-ए-नफ़्स को अपना माबूद बना लिया [78]? तो क्या आप उस पर निगहबान बन सकते हैं [79]?"
मुशरिकीन की आदत थी कि अगर उन्हें कोई ख़ूबसूरत पत्थर नज़र आता तो पुराने बुत को फेंक कर नए पत्थर की पूजा करने लगते थे। इसी तरह जो शख़्स अल्लाह के हुक्म और अक़्ल-ए-सलीम को छोड़कर अपने नफ़्स की ख़्वाहिशात, मर्ज़ी और लज़्ज़तों का ग़ुलाम बन जाए, वह गोया अपने नफ़्स को माबूद बना चुका है। नफ़्स-परस्ती शिर्क की एक ख़फ़ी (छुपी हुई) क़िस्म है।
अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ से फ़रमाया कि जो इंसान अपनी बद-बख़्ती से नफ़्स का बंदा बन चुका हो, आप उसके ईमान लाने के ज़िम्मेदार या वकील नहीं हैं। आपका काम सिर्फ़ हक़ पहुंचा देना है, किसी को ज़बरदस्ती मोमिन बनाना आपकी ज़िम्मेदारी नहीं।
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