कुरान - 25:44 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
أَمۡ تَحۡسَبُ أَنَّ أَكۡثَرَهُمۡ يَسۡمَعُونَ أَوۡ يَعۡقِلُونَۚ إِنۡ هُمۡ إِلَّا كَٱلۡأَنۡعَٰمِ بَلۡ هُمۡ أَضَلُّ سَبِيلًا

Transliteration: (Am tahsabu anna aksarahum yasma'oona aw ya'qiloon; in hum illaa kal an'aami bal hum adallu sabeelaa (section 4))

या आप यह समझते हैं कि उनमें से अक्सर लोग सुनते या समझते हैं [80]? वे तो बस मवेशियों की तरह हैं, बल्कि वे रास्ते से उनसे भी ज़्यादा भटके हुए हैं [81]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 44

"या आप समझते हैं कि उनमें से अक्सर सुनते या समझते हैं [80]? वे तो बस चौपायों की तरह हैं बल्कि उनसे भी ज़्यादा भटके हुए [81]!"

[80] सुनने और समझने की सलाहियत से महरूमी

काफ़िरों के पास कान और अक़्ल तो थी, लेकिन वे हक़ की बात को मानने की नीयत से नहीं सुनते थे और न नसीहत हासिल करने के लिए सोचते थे। उनका सुनना न सुनने के बराबर था।

[81] चौपायों (जानवरों) से भी बदतर दर्जा

अल्लाह तआला ने मुनकिरीन को मवेशियों (जानवरों) से तशबीह दी, बल्कि फ़रमाया कि वे जानवरों से भी बदतर हैं। क्योंकि जानवर अपने मालिक को पहचानता है, उसके इशारे पर चलता है, अपने नफ़ा और नुक़सान को समझता है और अल्लाह की तस्बीह करता है। लेकिन ये इंसान अशरफ़ुल-मख़्लूक़ात होकर भी अपने ख़ालिक़ को नहीं पहचानते और खुद अपने हाथों अपनी जान को जहन्नम की आग में झोंकते हैं।

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