Transliteration: (Am tahsabu anna aksarahum yasma'oona aw ya'qiloon; in hum illaa kal an'aami bal hum adallu sabeelaa (section 4))
"या आप समझते हैं कि उनमें से अक्सर सुनते या समझते हैं [80]? वे तो बस चौपायों की तरह हैं बल्कि उनसे भी ज़्यादा भटके हुए [81]!"
काफ़िरों के पास कान और अक़्ल तो थी, लेकिन वे हक़ की बात को मानने की नीयत से नहीं सुनते थे और न नसीहत हासिल करने के लिए सोचते थे। उनका सुनना न सुनने के बराबर था।
अल्लाह तआला ने मुनकिरीन को मवेशियों (जानवरों) से तशबीह दी, बल्कि फ़रमाया कि वे जानवरों से भी बदतर हैं। क्योंकि जानवर अपने मालिक को पहचानता है, उसके इशारे पर चलता है, अपने नफ़ा और नुक़सान को समझता है और अल्लाह की तस्बीह करता है। लेकिन ये इंसान अशरफ़ुल-मख़्लूक़ात होकर भी अपने ख़ालिक़ को नहीं पहचानते और खुद अपने हाथों अपनी जान को जहन्नम की आग में झोंकते हैं।
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