Transliteration: (Thumma qabadnaahu ilainaa qabdany yaseeraa)
"फिर हम उस (साये) को आहिस्ता-आहिस्ता अपनी तरफ़ समेट लेते हैं [86]।"
जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, साया धीरे-धीरे सिमटता चला जाता है यहाँ तक कि ज़वाल के वक़्त बिल्कुल कम रह जाता है। यह आहिस्ता-आहिस्ता का निज़ाम अल्लाह की बेमिसाल हिकमत है। अगर साया अचानक ग़ायब हो जाता और शदीद धूप पड़ जाती तो इंसान और नबातात की बर्दाश्त से बाहर होता।
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