Transliteration: (Wa Huwal lazee ja'ala lakumul laila libaasanw wannawma subaatanw wa ja'alan nahaara nushooraa)
"और वही है जिसने रात को लिबास [87], नींद को सुकून [88], और दिन को उठ खड़े होने का वक़्त बनाया [89]।"
अल्लाह तआला ने रात की तारीकी को इंसानों के लिए लिबास की तरह एक छुपाने वाला परदा बना दिया, ताकि लोग दुनिया के हंगामों से बचकर अपने घरों में सुकून और आराम पा सकें।
'सुबाता' यानी नींद को अल्लाह ने दिन भर की थकान दूर करने और आसाब को राहत देने का ज़रिया बनाया। अगर नींद की नेमत न होती तो इंसान की अक़्ल और जिस्मानी ताक़त चंद दिनों में फ़ना हो जाती।
अल्लाह ने दिन को रौशन बनाया ताकि लोग सोकर उठें, अपने मआश (रोज़ी) की तलाश में निकलें और ज़िन्दगी की सरगर्मियों को पूरा करें। यह निज़ाम क़ियामत के दिन दोबारा ज़िन्दा होने (नुशूर) की भी एक ज़िन्दा दलील है।
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