कुरान - 25:47 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

47
وَهُوَ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيۡلَ لِبَاسٗا وَٱلنَّوۡمَ سُبَاتٗا وَجَعَلَ ٱلنَّهَارَ نُشُورٗا

Transliteration: (Wa Huwal lazee ja'ala lakumul laila libaasanw wannawma subaatanw wa ja'alan nahaara nushooraa)

और वही है जिसने तुम्हारे लिए रात को लिबास (परदा) बनाया [87], और नींद को सुकून (राहत) बनाया [88], और दिन को उठ खड़े होने (रोज़ी कमाने) का वक़्त बनाया [89]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 47 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 47

"और वही है जिसने रात को लिबास [87], नींद को सुकून [88], और दिन को उठ खड़े होने का वक़्त बनाया [89]।"

[87] रात का तारीक लिबास

अल्लाह तआला ने रात की तारीकी को इंसानों के लिए लिबास की तरह एक छुपाने वाला परदा बना दिया, ताकि लोग दुनिया के हंगामों से बचकर अपने घरों में सुकून और आराम पा सकें।

[88] नींद का आराम और जिस्मानी तरो-ताज़गी

'सुबाता' यानी नींद को अल्लाह ने दिन भर की थकान दूर करने और आसाब को राहत देने का ज़रिया बनाया। अगर नींद की नेमत न होती तो इंसान की अक़्ल और जिस्मानी ताक़त चंद दिनों में फ़ना हो जाती।

[89] दिन का 'नुशूर' यानी मआश और ज़िंदगी

अल्लाह ने दिन को रौशन बनाया ताकि लोग सोकर उठें, अपने मआश (रोज़ी) की तलाश में निकलें और ज़िन्दगी की सरगर्मियों को पूरा करें। यह निज़ाम क़ियामत के दिन दोबारा ज़िन्दा होने (नुशूर) की भी एक ज़िन्दा दलील है।

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