कुरान - 25:49 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

49
لِّنُحۡـِۧيَ بِهِۦ بَلۡدَةٗ مَّيۡتٗا وَنُسۡقِيَهُۥ مِمَّا خَلَقۡنَآ أَنۡعَٰمٗا وَأَنَاسِيَّ كَثِيرٗا

Transliteration: (Linuhyiya bihee baldatan maitanw-wa nusqiyahoo mimmaa khalaqnaaa an'aamanw wa anaasiyya katheeraa)

ताकि हम उसके ज़रिये मुर्दा बस्ती (ज़मीन) को ज़िन्दगी बख़्शें, और अपनी पैदा की हुई बहुत सी चौपायों और इंसानों को वह पानी पिलाएं [93]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 49 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 49

"ताकि हम मुर्दा बस्ती को ज़िन्दगी बख़्शें, और अपनी मख़्लूक़ात में से बहुत से चौपायों और इंसानों को पानी पिलाएं [93]।"

[93] मुर्दा ज़मीन का ज़िन्दा होना और मख़्लूक़ की सैराबी

सूखी, बंजर और मुर्दा ज़मीन बारिश के पानी से लहलहा उठती है, उसमें तरह-तरह के फल, अनाज और सब्ज़ियां उग आती हैं। यही पानी जंगलों और सहराओं में जमा होकर लाखों जंगली जानवरों, पालतू मवेशियों और इंसानों की प्यास बुझाता है। यह मुर्दा ज़मीन का ज़िन्दा होना इस बात की दलील है कि अल्लाह क़ियामत के दिन मुर्दों को भी इसी तरह दोबारा ज़िन्दा फ़रमाएगा।

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