कुरान - 25:52 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
فَلَا تُطِعِ ٱلۡكَٰفِرِينَ وَجَٰهِدۡهُم بِهِۦ جِهَادٗا كَبِيرٗا

Transliteration: (Falaa tuti'il kaafireena wa jaahidhum bihee jihaadan kabeeraa)

पस आप काफ़िरों का कहना हरगिज़ न मानिए, और इस (क़ुरआन) के ज़रिये उनके ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ा जिहाद (जिहादे-कबीर) कीजिए [96]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 52

"पस आप काफ़िरों का कहना न मानिए, और इस (क़ुरआन) के ज़रिये उनके ख़िलाफ़ बड़ा जिहाद कीजिए [96]!"

[96] 'जिहाद-ए-कबीर' यानी क़ुरआन के दलाइल से इल्मी व तब्लीग़ी जिहाद

यह आयत मक्की दौर में नाज़िल हुई जब तलवार से जंग की इजाज़त नहीं थी। अल्लाह तआला ने हुज़ूर ﷺ और अहले-ईमान को हुक्म दिया कि काफ़िरों की धमकियों और मुसालेहत की बातिल शर्तों की परवाह न करें, और क़ुरआन-ए-पाक के रौशन दलाइल, हिकमत और हक के पैग़ाम के ज़रिये बातिल का मुक़ाबला करें। क़ुरआन के ज़रिए दलाइल की जंग लड़ना 'जिहाद-ए-कबीर' (बड़ा जिहाद) है।

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