कुरान - 25:55 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
وَيَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُهُمۡ وَلَا يَضُرُّهُمۡۗ وَكَانَ ٱلۡكَافِرُ عَلَىٰ رَبِّهِۦ ظَهِيرٗا

Transliteration: (Wa ya'budoona min doonil laahi maa laa yanfa'uhum wa laa yadurruhum; wa kaanal kaafiru 'alaa Rabbihee zaheeraa)

और वे अल्लाह को छोड़कर ऐसी चीज़ों की इबादत करते हैं जो न उन्हें कोई नफ़ा पहुंचा सकती हैं और न उनका कोई नुक़सान कर सकती हैं [100]; और काफ़िर तो अपने रब के मुक़ाबले में (शैतान का) मददगार बना हुआ है [101]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 55

"और वे अल्लाह को छोड़कर ऐसी चीज़ों को पूजते हैं जो न नफ़ा दें न नुक़सान [100]; और काफ़िर तो अपने रब के मुक़ाबले में (शैतान का) मददगार है [101]!"

[100] बे-इख़्तियार बुतों की पूजा की हिमाक़त

अल्लाह की इतनी वाज़ेह निशानियों और नेमतों के बावजूद मुशरिकीन ऐसे पत्थरों और बुतों के आगे सजदा करते हैं जो न उन्हें एक दाने का नफ़ा दे सकते हैं और न किसी आफ़त का नुक़सान पहुंचा सकते हैं।

[101] रब्बे-करीम के मुक़ाबले में शैतान की हिमायत

अल्लाह ने इंसान को पैदा किया, रिज़्क़ दिया और हर नेमत बख़्शी, मगर काफ़िर अपने पैदा करने वाले रब की नाफ़रमानी करके उसके दुश्मन शैतान का मुआवीन और मददगार बन जाता है। यह इंसान की इंतिहाई एहसान-फ़रामोशी और ज़ुल्म है।

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