कुरान - 25:57 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

57
قُلۡ مَآ أَسۡـَٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍ إِلَّا مَن شَآءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلٗا

Transliteration: (Qul maaa as'alukum 'alaihi min ajrin illaa man shaaa'a ai yattakhiza ilaa Rabbihee sabeelaa)

आप कह दीजिए, 'मैं इस पर तुमसे कोई उजरत (मुआवज़ा) नहीं मांगता सिवाय इसके कि जो कोई चाहे अपने रब की तरफ़ (हिदायत का) रास्ता इख़्तियार कर ले [103]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 57 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 57

"आप कह दीजिए, 'मैं तुमसे कोई उजरत नहीं मांगता सिवाय इसके कि जो चाहे अपने रब की तरफ़ रास्ता इख़्तियार कर ले [103]।'"

[103] बे-ग़रज़ तब्लीग़ और अहले-ईमान की हिदायत ही अस्ल ख़ुशी

हुज़ूर ﷺ ने साफ़ फ़रमा दिया कि मैं अपनी इस तब्लीग़ और ख़ैरख़्वाही पर तुमसे किसी दुनियावी माल, दौलत या सरदारी का मुतालबा नहीं करता। मेरा सिला सिर्फ़ यह है कि तुम में से जो कोई चाहे वह हिदायत पाकर अपने रब की रज़ा का रास्ता पकड़ ले और जहन्नम से बच जाए। नबी की सबसे बड़ी तमन्ना यही होती है कि मख़्लूक़ ख़ुदा से जुड़ जाए।

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