कुरान - 25:63 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

63
وَعِبَادُ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلَّذِينَ يَمۡشُونَ عَلَى ٱلۡأَرۡضِ هَوۡنٗا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ ٱلۡجَٰهِلُونَ قَالُواْ سَلَٰمٗا

Transliteration: (Wa 'ibaadur Rahmaanil lazeena yamshoona 'alal ardi hawnanw wa izaa khaata bahumul jaahiloona qaaloo salaamaa)

और रहमान के (ख़ास) बंदे वे हैं जो ज़मीन पर आजिज़ी और वक़ार के साथ चलते हैं [112], और जब जाहिल लोग उनसे बात करते हैं तो वे कहते हैं, 'सलाम [113]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 63 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 63

"और रहमान के बंदे वे हैं जो ज़मीन पर आहिस्तगी व आजिज़ी से चलते हैं [112], और जब जाहिल ख़िताब करें तो कहते हैं, 'सलाम [113]!'"

[112] 'इबादुर-रहमान' की पहली सिफ़त: आजिज़ी और सादगी

यहाँ से सूरह के आख़िर तक अल्लाह तआला ने अपने पसंदीदा और ख़ास बन्दों ('इबादुर-रहमान') की सिफ़ात बयान फ़रमाई हैं। उनकी पहली सिफ़त यह है कि वे ज़मीन पर अकड़कर, इतराकर या तकब्बुर से नहीं चलते, बल्कि आजिज़ी, नर्मी और संजीदगी के साथ पुर-वक़ार चाल चलते हैं। उनकी चाल से भी अल्लाह का ख़ौफ़ और तवाज़ो ज़ाहिर होती है।

[113] जाहिलों की बदकलामियों का सब्र और शराफ़त से जवाब

जब बेवक़ूफ़ और जाहिल लोग उनसे बदतमीज़ी, गाली-गलौज या बेहूदा बातें करते हैं, तो वे बदले में बुराई का जवाब बुराई से नहीं देते, बल्कि 'सलाम' कहकर (यानी शराफ़त और सुलह-पसंदी के साथ) उनसे किनाराकश हो जाते हैं और अपनी ज़बान को गालियों से महफ़ूज़ रखते हैं।

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