Transliteration: (Wa 'ibaadur Rahmaanil lazeena yamshoona 'alal ardi hawnanw wa izaa khaata bahumul jaahiloona qaaloo salaamaa)
"और रहमान के बंदे वे हैं जो ज़मीन पर आहिस्तगी व आजिज़ी से चलते हैं [112], और जब जाहिल ख़िताब करें तो कहते हैं, 'सलाम [113]!'"
यहाँ से सूरह के आख़िर तक अल्लाह तआला ने अपने पसंदीदा और ख़ास बन्दों ('इबादुर-रहमान') की सिफ़ात बयान फ़रमाई हैं। उनकी पहली सिफ़त यह है कि वे ज़मीन पर अकड़कर, इतराकर या तकब्बुर से नहीं चलते, बल्कि आजिज़ी, नर्मी और संजीदगी के साथ पुर-वक़ार चाल चलते हैं। उनकी चाल से भी अल्लाह का ख़ौफ़ और तवाज़ो ज़ाहिर होती है।
जब बेवक़ूफ़ और जाहिल लोग उनसे बदतमीज़ी, गाली-गलौज या बेहूदा बातें करते हैं, तो वे बदले में बुराई का जवाब बुराई से नहीं देते, बल्कि 'सलाम' कहकर (यानी शराफ़त और सुलह-पसंदी के साथ) उनसे किनाराकश हो जाते हैं और अपनी ज़बान को गालियों से महफ़ूज़ रखते हैं।
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