कुरान - 25:68 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

68
وَٱلَّذِينَ لَا يَدۡعُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ وَلَا يَقۡتُلُونَ ٱلنَّفۡسَ ٱلَّتِي حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلۡحَقِّ وَلَا يَزۡنُونَۚ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٰلِكَ يَلۡقَ أَثَامٗا

Transliteration: (Wallazeena laa yad'oona ma'al laahi ilaahan aakhara wa laa yaqtuloonan nafsal latee harramal laahu illaa bilhaqqi wa laa yaznoon; wa mai yaf'al zaalika yalqa 'athaamaa)

और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को नहीं पूजते [118], और किसी जान को नाहक़ क़त्ल नहीं करते [119] जिसे अल्लाह ने हराम किया है, और न वे ज़िना करते हैं; और जो कोई ये काम करेगा वह सख्त सज़ा का सामना करेगा; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 68 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 68

"और जो अल्लाह के सिवा किसी माबूद को नहीं पूजते [118], न नाहक़ जान क़त्ल करते हैं [119], न ज़िना करते हैं; और जो ऐसा करेगा सज़ा पाएगा;"

[118] ख़ालिस तौहीद और शिर्क से परहेज़

उनकी पाँचवीं सिफ़त यह है कि वे सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करते हैं और किसी भी मख़्लूक़ को उसका शरीक नहीं ठहराते। तौहीद तमाम नेकियों की बुनियाद है।

[119] कबीरा गुनाहों (क़त्ल-ए-नाहक़ और ज़िना) से हिफ़ाज़त

वे किसी भी इंसान को नाहक़ क़त्ल नहीं करते जिसकी जान को अल्लाह ने मुक़द्दस व हराम क़रार दिया है, और न बदकारी (ज़िना) के क़रीब जाते हैं। शिर्क, नाहक़ क़त्ल और ज़िना—ये तीनों सबसे बड़े कबीरा गुनाह हैं। जो इन गुनाहों का मुर्तकिब होगा, वह आख़िरत में 'असामा' यानी जहन्नम की ख़ौफ़नाक वादी और सख्त अज़ाब में डाला जाएगा।

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