Transliteration: (Wa maaa arsalnaa min qablika mir Rasoolinnw wa laa Nabiyyin illaaa izaaa tamannaaa alqash Shaitaanu feee umniy yatihee fa yansakhul laahu maa yulqish Shaitaanu summa yuhkimul laahu aayaatih; wallaahu 'Aleemun Hakeem)
"और हमने आपसे पहले जो भी रसूल या नबी भेजा [112], तो जब भी उसने (कलाम) पढ़ा, तो शैतान ने उसकी क़िराअत (के सुनने वालों के ख़्याल) में कुछ (गलतफ़हमी) डाल दी [113]; फिर अल्लाह उस चीज़ को मिटा देता है जो शैतान डालता है, फिर अल्लाह अपनी आयतों को मज़बूत व पक्का कर देता है [114]; और अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हिकमत वाला है।"
रसूल वह साहिबे शरीअत पैग़म्बर होता है जिसे नई किताब या नई शरीअत दी गई हो, और नबी आम होता है चाहे उसे नई शरीअत मिली हो या वह साबिक़ा शरीअत की तब्लीग़ करता हो। हर रसूल नबी होता है, मगर हर नबी रसूल नहीं होता।
अम्बिया-ए-किराम (अलैहिमुस्सलाम) माअ़सूम होते हैं; शैतान का असर उनकी ज़बान या वह्य पर कभी नहीं हो सकता। यहाँ मुराद यह है कि जब नबी कलाम पढ़ते हैं, तो शैतान काफ़िरों और सुनने वालों के कानों और दिलों में वसवसा डालकर गलतफ़हमी पैदा करने की कोशिश करता है ताकि वे हक़ से भटक जाएं।
अल्लाह तआला शैतान के हर वसवसे और फ़ितने को बातिल कर देता है और अपनी आयतों को पूरी दलील और वाज़ेह हिदायत के साथ साबित व महफ़ूज़ फ़रमा देता है। क़ुरआन की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा खुद अल्लाह ने लिया है।
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