कुरान - 22:53 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

53
لِّيَجۡعَلَ مَا يُلۡقِي ٱلشَّيۡطَٰنُ فِتۡنَةٗ لِّلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٞ وَٱلۡقَاسِيَةِ قُلُوبُهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ لَفِي شِقَاقِۭ بَعِيدٖ

Transliteration: (Liyaj'ala maa yulqish Shaitaanu fitnatal lillazeena fee quloobihim maradunw walqaasiyati quloobuhum; wa innaz zaalimeena lafee shiqaaqim ba'eed)

53. ताकि वह उस (वसवसे) को जिसे शैतान डालता है उन लोगों के लिए आज़माइश बना दे जिनके दिलों में बीमारी (निफ़ाक़) है और जिनके दिल सख़्त हैं [115]; और बेशक ज़ालिम लोग दूर की दुश्मनी में पड़े हुए हैं [116] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 53 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 53 की तफ़सीर

"ताकि वह उस (वसवसे) को जिसे शैतान डालता है उन लोगों के लिए आज़माइश बना दे जिनके दिलों में बीमारी (निफ़ाक़) है और जिनके दिल सख़्त हैं [115]; और बेशक ज़ालिम लोग दूर की दुश्मनी में पड़े हुए हैं [116] ।"

[115] बीमार और सख़्त दिलों के लिए आज़माइश

शैतानी वसवसे मुनाफ़िक़ों और कुफ़्फ़ार के लिए आज़माइश बन जाते हैं। जिनके दिलों में निफ़ाक़ की बीमारी है या जिनके दिल कुफ़्र की वजह से पत्थर हो चुके हैं, वे इन वसवसों को पकड़ कर शक और शुबहात में मुब्तला हो जाते हैं और हक़ से दूर हो जाते हैं।

[116] ज़ालिमों की मुस्तक़िल दुश्मनी

ये ज़ालिम लोग हक़ से इतनी दूर निकल चुके हैं कि उनकी दुश्मनी और ज़िद की कोई हद नहीं रही। वे हर मौक़े पर हक़ का मुक़ाबला करने के बहाने तलाश करते हैं।

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