Transliteration: (La'amruka innahum lafee sakratihim ya'mahoon)
(ऐ महबूब!) तुम्हारी जान की क़सम [83], बेशक वे अपने नशे में अंधे होकर भटक रहे थे।
इससे मालूम हुआ कि हुज़ूर अकरम ﷺ की मुबारक ज़िन्दगी अल्लाह तआला की बारगाह में तमाम कायनात से ज़्यादा अज़ीज़ व महबूब है, क्योंकि अल्लाह तआला ने पूरे क़ुरआन में अपने महबूब के सिवा किसी की ज़िन्दगी की क़सम नहीं खाई ('ल-अमरुक')। इसके अलावा जो अक़्ल भले-बुरे में तमीज़ न कर सके, वह अक़्ल नहीं बल्कि अंधापन है। वे बदकार अपनी वासना और सरकशी के नशे में अंधे होकर भटक रहे थे।
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