कुरान - 49:10 सूरह अल-हुजुरात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

10
إِنَّمَا ٱلۡمُؤۡمِنُونَ إِخۡوَةٞ فَأَصۡلِحُواْ بَيۡنَ أَخَوَيۡكُمۡۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ

Transliteration: (Innamal mu'minoona ikhwatun fa aslihoo baina akhawaykum wattaqul laaha la'allakum turhamoon (section 1))

बेशक तमाम मोमिन आपस में भाई-भाई हैं [25], तो अपने दो भाइयों के दरमियान सुलह करा दिया करो, और अल्लाह से डरो ताकि तुम पर रहम किया जाए! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हुजुरात आयत 10 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हुजुरात तफ़सीर - आयत 10

"बेशक तमाम मोमिन आपस में भाई-भाई हैं [25], तो अपने दो भाइयों के दरमियान सुलह करा दिया करो, और अल्लाह से डरो ताकि तुम पर रहम किया जाए!"


[25] इस्लामी भाईचारा (उख़ुव्वत-ए-इस्लामी)

अल्लाह तआला ने इस आयत में दुनिया भर के तमाम मुसलमानों के दरमियान दीनी भाईचारे का एलान फ़रमाया।

  • नस्ल और रंग से ऊपर: चाहे कोई अरबी हो या अजमी, गोरा हो या काला, अमीर हो या ग़रीब—कलिमा-ए-तौहीद पढ़ते ही वे सब आपस में सगे भाइयों से बढ़कर रूहानी भाई बन जाते हैं।
  • सुलह कराने का फ़र्ज़: जिस तरह दो सगे भाइयों में झगड़ा हो जाए तो पूरा ख़ानदान सुलह कराने की कोशिश करता है, उसी तरह अगर दो मुसलमानों या दो जमाअतों में इख़्तिलाफ़ हो जाए तो तमाशा देखने के बजाय उनके बीच प्यार और इंसाफ़ से सुलह कराना हर मोमिन का दीनी फ़र्ज़ है।
  • रहम की शर्त: अल्लाह की रहमत उन्हीं पर नाज़िल होती है जो दिलों में कीना नहीं रखते बल्कि आपस में भाईचारे और मुहब्बत को बढ़ावा देते हैं।

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