Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanuj taniboo kaseeram minaz zanni inna ba'daz zanniismunw wa laa tajassasoo wa la yaghtab ba'dukum ba'daa; a yuhibbu ahadukum any yaakula lahma akheehi maitan fakarih tumooh; wattaqul laa; innal laaha tawwaabur Raheem)
"ऐ ईमान वालो! बहुत से गुमानों (शकों) से बचो [33], बेशक बाज़ गुमान गुनाह होते हैं [34]। और एक दूसरे के ऐबों की टोह (जासूसी) न लगाओ [35], और न कोई किसी की ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) करे [36]! क्या तुम में से कोई यह पसंद करेगा कि वह अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाए? तो तुम इससे नफ़रत करते हो [37]! और अल्लाह से डरो। बेशक अल्लाह बहुत तौबा क़बूल फ़रमाने वाला, निहायत रहम करने वाला है!"
किसी मुसलमान के बारे में बिना किसी ठोस दलील के दिल में बुरा ख़्याल या शक बिठाना 'बदगुमानी' है और यह गुनाह-ए-कबीरा है। मोमिन का शेवा यह होना चाहिए कि वह अपने भाई के हर अमल की अच्छी तावील (हुस्ने ज़न) करे।
दूसरों के घरों में झाँकना, उनकी गुप्त बातों को कान लगाकर सुनना या उनके छुपे हुए ऐबों की तलाश करना हराम है। इस्लाम इंसान की इज़्ज़त और व्यक्तिगत आज़ादी की हिफ़ाज़त करता है। जो दूसरों के ऐब छुपाता है, अल्लाह क़यामत के दिन उसके ऐबों पर पर्दा डालेगा।
किसी मुसलमान की पीठ पीछे ऐसी बात कहना जिसे सुनकर उसे बुरा लगे, यह 'ग़ीबत' है—चाहे वह बात उसमें सचमुच मौजूद ही क्यों न हो। (और अगर वह बात उसमें न हो, तो वह 'बोहतन' यानी झूठा इल्ज़ाम है जो उससे भी बड़ा गुनाह है)।
अल्लाह तआला ने ग़ीबत की घिनौनी हक़ीक़त को स्पष्ट करने के लिए मिसाल दी कि किसी भाई की ग़ीबत करना ऐसा ही है जैसे कोई अपने मरे हुए सगे भाई का सड़ा हुआ गोश्त दाँतों से नोच-नोच कर खाए! जिस तरह मुर्दार का गोश्त खाने से इंसान की रूह काँप उठती है, उसी तरह ग़ीबत से भी सख़्त नफ़रत करनी चाहिए।
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