Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanoo laa yaskhar qawmum min qawmin 'asaaa anyyakoonoo khairam minhum wa laa nisaaa'um min nisaaa'in 'Asaaa ay yakunna khairam minhunna wa laa talmizooo anfusakum wa laa tanaabazoo bil alqaab; bi'sal ismul fusooqu ba'dal eemaan; wa mal-lam yatub fa-ulaaa'ika humuz zaalimoon)
"ऐ ईमान वालो! न कोई मर्द दूसरे मर्दों का मज़ाक़ उड़ाए [26], हो सकता है कि वे (जिनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है) उनसे बेहतर हों [27]; और न औरतें दूसरी औरतों का मज़ाक़ उड़ाएँ, हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों [28]! और न आपस में एक दूसरे पर ऐब लगाओ [29], और न एक दूसरे को बुरे नामों (उपनामों) से पुकारो [30]! ईमान लाने के बाद गुनाहगार का नाम पाना क्या ही बुरा है [31]! और जो तौबा न करें, तो वही लोग ज़ालिम हैं [32]!"
किसी मुसलमान की ग़रीबी, जिस्मानी कमी, लिबास या बोलने के अंदाज़ का मज़ाक़ उड़ाना इस्लाम में सख़्त हराम है। यह तकब्बुर (अहंकार) की निशानी है।
अल्लाह की नज़र में इंसान की हैसियत उसकी दौलत या शक्ल से नहीं, बल्कि उसके दिल के तक़वे से होती है। मुमकिन है कि जिसे तुम कमज़ोर या हक़ीर समझ रहे हो, वह अल्लाह की बारगाह में तुमसे कहीं ज़्यादा महबूब और मुक़र्रब हो। औरतों में यह आदत ज़्यादा पाई जाती है, इसलिए उन्हें अलग से नसीहत फ़रमाई गई।
कुरआन ने फ़रमाया: 'व ला तल्मिज़ू अनफ़ुसकुम' (अपने आप पर ऐब न लगाओ)। यानी जब तुम किसी दूसरे मुसलमान भाई पर ताना कसते हो, तो हक़ीक़त में अपनी ही मिल्लत और अपने ही वजूद पर ताना कसते हो।
किसी को ऐसे नाम से पुकारना जिससे उसे तकलीफ़ हो (जैसे लंगड़ा, अंधा, काना, फ़ासिक़)—यह सख़्त मना है। हाँ, अगर कोई लक़ब इज़्ज़त और मोहब्बत का हो (जैसे सिद्दीक़, फ़ारूक़, ग़नी, हैदर)—तो वह जाइज़ व मुस्तहसन है।
ईमान की पाकीज़ा दौलत पाने के बाद किसी को फ़ासिक़ या बुरे लक़ब से याद करना बदतरीन बात है। जो लोग इन गुनाहों से तौबा नहीं करते, वे अपनी ही जानों पर ज़ुल्म करने वाले हैं।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat