Transliteration: (Yaaa ayyuhan naasu innaa khalaqnaakum min zakarinw wa unsaa wa ja'alnaakum shu'oobanw wa qabaaa'ila lita'aarafoo inna akramakum 'indal laahi atqaakum innal laaha 'Aleemun khabeer)
"ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द (आदम) और एक औरत (हव्वा) से पैदा किया, और तुम्हें क़ौमों और क़बीलों में बाँट दिया [38] ताकि तुम एक दूसरे को पहचान सको [39]। बेशक अल्लाह के नज़दीक तुम में सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो तुम में सबसे ज़्यादा परहेज़गार (मुत्तक़ी) है [40]! बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है!"
तमाम इंसानियत हज़रत आदम और हज़रत हव्वा अलैहिमस सलाम की औलाद है। इसलिए नस्ल, ख़ानदान, क़बीले या ज़ात-पात के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा समझना सरासर जहालत है। अल्लाह ने क़ौमें और क़बीले (शुआ़ब व क़बाइल) केवल आपसी पहचान और परिचय के लिए बनाए हैं, न कि घमंड और नस्लपरस्ती के लिए।
फ़तह-ए-मक्का के दिन जब हज़रत बिलाल हबशी रज़ियल्लाहु अन्हु ने काबा की छत पर चढ़कर अज़ान दी, तो मक्का के बाज़ घमंडी मुशरिकीन ने कहा कि क्या इस काले ग़ुलाम के सिवा कोई और अज़ान के लिए नहीं मिला था? इस पर यह ऐतिहासिक आयत नाज़िल हुई।
हुज़ूर अकरम ﷺ ने अपने आख़िरी ख़ुत्बे (ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा) में एलान फ़रमाया: "ऐ लोगो! किसी अरबी को किसी अजमी पर, और किसी अजमी को किसी अरबी पर; न किसी गोरे को किसी काले पर, और न किसी काले को किसी गोरे पर कोई फ़ज़ीलत हासिल नहीं, मगर सिर्फ़ तक़वे और परहेज़गारी के ज़रिए।" अल्लाह के यहाँ अमीर-ग़रीब या ऊँची-नीची ज़ात की कोई क़ीमत नहीं; जो दिल जितना मुत्तक़ी है, वह बारगाह-ए-इलाही में उतना ही मुअज़्ज़ज़ और मुक़र्रब है।
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