कुरान - 49:14 सूरह अल-हुजुरात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
۞قَالَتِ ٱلۡأَعۡرَابُ ءَامَنَّاۖ قُل لَّمۡ تُؤۡمِنُواْ وَلَٰكِن قُولُوٓاْ أَسۡلَمۡنَا وَلَمَّا يَدۡخُلِ ٱلۡإِيمَٰنُ فِي قُلُوبِكُمۡۖ وَإِن تُطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ لَا يَلِتۡكُم مِّنۡ أَعۡمَٰلِكُمۡ شَيۡـًٔاۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ

Transliteration: (Qaalatil-A 'raabu aamannaa qul lam tu'minoo wa laakin qoolooo aslamnaa wa lamma yadkhulil eemaanu fee quloobikum wa in tutee'ul laaha wa Rasoolahoo laa yalitkum min a'maalikum shai'aa; innal laaha Ghafoorur Raheem)

देहाती बद्दू बोले: "हम ईमान लाए!" आप फ़रमा दीजिए: "तुम ईमान नहीं लाए [41], बल्कि तुम यूँ कहो कि 'हम ताबेअ़ (मुसलमान) हो गए' [42], क्योंकि ईमान अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल नहीं हुआ है [43]। और अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म मानोगे [44], तो वह तुम्हारे आमाल में से कुछ भी कम न करेगा [45]। बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला, निहायत रहम फ़रमाने वाला है!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हुजुरात आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हुजुरात तफ़सीर - आयत 14

"देहाती बद्दू बोले: 'हम ईमान लाए!' आप फ़रमा दीजिए: 'तुम ईमान नहीं लाए [41], बल्कि तुम यूँ कहो कि 'हम ताबेअ़ (मुसलमान) हो गए' [42], क्योंकि ईमान अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल नहीं हुआ है [43]। और अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म मानोगे [44], तो वह तुम्हारे आमाल में से कुछ भी कम न करेगा [45]। बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला, निहायत रहम फ़रमाने वाला है!'"


[41] [42] [43] इस्लाम और ईमान का नाज़ुक फ़र्क़

क़बीला बनू असद के कुछ देहाती क़हतसाली के ज़माने में मदीना आए और ज़बान से कलिमा पढ़कर कहने लगे कि हम मोमिन हो गए, ताकि उन्हें सदक़ात और इमदाद मिल सके।

अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ईमान केवल ज़बानी इक़रार का नाम नहीं है; सच्चा ईमान वह है जो दिल की गहराइयों में उतर जाए और नफ़्स को पूरी तरह रब की रज़ा के ताबेअ़ कर दे। तुमने अभी ज़ाहिरी तौर पर तलवार के डर या ज़रूरत के तहत इस्लाम क़बूल किया है (अस्लमना), लेकिन दिल में रूहानी यक़ीन की चाशनी अभी पैदा नहीं हुई।


[44] [45] इताअत और नेकियों का पूरा सवाब

अगर वे सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत शुरू कर दें और मुनाफ़िक़त छोड़ दें, तो अल्लाह उनके किसी नेक अमल को ज़ाया नहीं फ़रमाएगा बल्कि पूरा-पूरा अज्र अता फ़रमाएगा।

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