कुरान - 49:1 सूरह अल-हुजुरात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تُقَدِّمُواْ بَيۡنَ يَدَيِ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۖ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٞ

Transliteration: (Yaa ayyuhal lazeena aamanoo la tuqaddimoo baina yada yil laahi wa Rasoolihee wattaqul laah; innal laaha samee'un 'Aleem)

ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो [1], और अल्लाह से डरो [2]। बेशक अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, ख़ूब जानने वाला है! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हुजुरात आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हुजुरात तफ़सीर - आयत 1

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो [1], और अल्लाह से डरो [2]। बेशक अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, ख़ूब जानने वाला है!"


[1] अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से आगे न बढ़ना (अदब का अज़ीम उसूल)

इस आयत में ईमान वालों को हुज़ूर अकरम ﷺ की बारगाह-ए-अक़दस का सबसे बुनियादी और नाज़ुक अदब सिखाया गया है। 'अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो' के कई गहरे मफ़हूम हैं:

  • कलाम में आगे न बढ़ना: जब तक हुज़ूर ﷺ बात न फ़रमाएँ, अपनी तरफ़ से बोलना शुरू न करो; और जब हुज़ूर ﷺ फ़रमाएँ, तो पूरे अदब और ख़ामोशी से सुनो।
  • फ़ैसलों और शरीअत में आगे न बढ़ना: किसी भी मामले—चाहे वह इबादत हो (जैसे रमज़ान का रोज़ा, ईद, क़ुरबानी) या मामलात व सियासत—हुज़ूर ﷺ के हुक्म और फ़ैसले से पहले अपना कोई फ़ैसला न करो।
  • रास्ते में आगे न चलना: चलते वक़्त भी हुज़ूर ﷺ के आगे न चलो, बल्कि पीछे या बराबर में अदब के साथ चलो।

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि यह आयत साबित करती है कि हुज़ूर ﷺ का अदब व ताज़ीम शरीअत के तमाम अहकाम की जान और रूह है।


[2] तक़्वा और ख़ुदा का ख़ौफ़

अल्लाह से डरो कि कहीं नबी-ए-करीम ﷺ की शान में कोई अदना सी बेअदबी या बेध्यानी न हो जाए, क्योंकि अल्लाह तुम्हारी हर बात सुनता है और दिलों की नीयतों को ख़ूब जानता है।

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