कुरान - 49:6 सूरह अल-हुजुरात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

6
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِن جَآءَكُمۡ فَاسِقُۢ بِنَبَإٖ فَتَبَيَّنُوٓاْ أَن تُصِيبُواْ قَوۡمَۢا بِجَهَٰلَةٖ فَتُصۡبِحُواْ عَلَىٰ مَا فَعَلۡتُمۡ نَٰدِمِينَ

Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanoo in jaaa'akum faasiqum binaba in fatabaiyanooo an tuseeboo qawmam bijahalatin fatusbihoo 'alaa maa fa'altum naadimeen)

ऐ ईमान वालो [11]! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए, तो ख़ूब तहक़ीक़ (जाँच-पड़ताल) कर लिया करो [12] [13], कहीं ऐसा न हो कि तुम नादानी में किसी क़ौम को नुक़सान पहुँचा बैठो, फिर अपने किए पर पछताते रहो [14]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हुजुरात आयत 6 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हुजुरात तफ़सीर - आयत 6

"ऐ ईमान वालो [11]! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए, तो ख़ूब तहक़ीक़ (जाँच-पड़ताल) कर लिया करो [12] [13], कहीं ऐसा न हो कि तुम नादानी में किसी क़ौम को नुक़सान पहुँचा बैठो, फिर अपने किए पर पछताते रहो [14]!"


[11] [12] शान-ए-नुज़ूल — वलीद बिन उक़बा और बनू मुस्तलिक़ का वाक़िया

हुज़ूर अकरम ﷺ ने हज़रत वलीद बिन उक़बा को क़बीला बनू मुस्तलिक़ से ज़कात वसूल करने के लिए भेजा। जब बनू मुस्तलिक़ को पता चला तो वे हुज़ूर ﷺ के क़ासिद के इस्तक़बाल और ताज़ीम के लिए हथियारों समेत बाहर निकले। वलीद बिन उक़बा ने समझा कि वे शायद जंग करने आ रहे हैं, इसलिए वे डरकर रास्ते से ही वापस लौट आए और हुज़ूर ﷺ से अर्ज़ किया कि उन्होंने ज़कात देने से इनकार कर दिया और मुझे क़त्ल करना चाहा।

हुज़ूर ﷺ ने लश्कर भेजने का इरादा फ़रमाया, लेकिन पहले हज़रत ख़ालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु को तहक़ीक़ के लिए भेजा। ख़ालिद बिन वलीद ने जाकर देखा कि वे लोग अज़ान दे रहे हैं, नमाज़ें पढ़ रहे हैं और ज़कात देने के लिए ख़ुशी से तैयार बैठे हैं। इस पर यह आयत नाज़िल हुई।


[13] अख़बार और ख़बरों की तहक़ीक़ का क़ानून

यह आयत इस्लामी न्यायशास्त्र (उसूले फ़िक़्ह व हदीस) का अज़ीम उसूल तय करती है: किसी भी ऐसी ख़बर पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए जो किसी अविश्वसनीय या फ़ासिक़ शख़्स से आए। फ़ैसले से पहले पूरी छानबीन और तहक़ीक़ लाज़िमी है।


[14] बे-तहक़ीक़ फ़ैसले का नुक़सान और पछतावा

अगर बिना तहक़ीक़ के कार्रवाई की जाती, तो बेगुनाह मुसलमानों पर हमला हो जाता और बाद में सिवाय शर्मिंदगी और पछतावे के कुछ हाथ न आता।

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