Transliteration: (Innal lazeena yaghud doona aswaatahum 'inda Rasoolil laahi ulaaa'ikal lazeenam tah anal laahu quloobahum littaqwaa; lahum maghfiratunw wa'ajrun 'azeem)
"बेशक जो लोग अल्लाह के रसूल के हुज़ूर अपनी आवाज़ें नीची रखते हैं [5], यही वे लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने परहेज़गारी (तक़वे) के लिए परख लिया है [6]। उनके लिए बख़्शिश और बहुत बड़ा अज्र है [7]!"
जब आयत नंबर 2 नाज़िल हुई, तो सहाबा किराम पर ऐसा ख़ौफ़ और अदब तारी हुआ कि हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हुमा हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में ऐसे धीमी आवाज़ में अर्ज़ करते थे जैसे कोई सरगोशी (whisper) कर रहा हो, यहाँ तक कि हुज़ूर ﷺ को दोबारा पूछना पड़ता था। हज़रत साबित बिन क़ैस रज़ियल्लाहु अन्हु, जिनकी आवाज़ क़ुदरती तौर पर बुलंद थी, ख़ौफ़ के मारे अपने घर में बैठकर रोने लगे कि कहीं मेरे आमाल बर्बाद न हो गए हों; तब हुज़ूर ﷺ ने उन्हें जन्नत की बशारत दी।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि जो लोग नबी ﷺ का ऐसा गहरा अदब करते हैं, अल्लाह ने उनके दिलों को तक़वे की कसौटी पर परख कर पूरी तरह शुद्ध और ख़ालिस बना दिया है। अदब-ए-रसूल ही हक़ीक़ी तक़वे की पहचान है।
ऐसे बा-अदब मोमिनों के लिए अल्लाह की तरफ़ से मुकम्मल मग़फ़िरत और जन्नत का अज़ीम अज्र तय है।
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