Transliteration: (Yaa ayyuhal lazeena aamanoo laa tarfa'ooo aswaatakum fawqa sawtin Nabiyi wa laa tajharoo lahoo bilqawli kajahri ba'dikum liba 'din an tahbata a 'maalukum wa antum laa tash'uroon)
"ऐ ईमान वालो! अपनी आवाज़ें नबी की आवाज़ से ऊँची न करो [3], और न उनके सामने ऐसे ज़ोर से बोलो जैसे तुम आपस में एक दूसरे से ज़ोर से बोलते हो [4], कहीं तुम्हारे आमाल बर्बाद न हो जाएँ और तुम्हें ख़बर भी न हो!"
यह आयत हुज़ूर अकरम ﷺ की बारगाह के मक़ाम-ए-ताज़ीम को स्पष्ट करती है। मुसलमानों को सख़्ती से मना फ़रमाया गया कि जब वे हुज़ूर ﷺ से बात करें, तो अपनी आवाज़ को हमेशा हुज़ूर ﷺ की मुबारक आवाज़ से नीची रखें। नबी के सामने चीख़ना या तेज़ आवाज़ में बोलना सरासर बेअदबी है।
जिस तरह आम इंसान आपस में एक-दूसरे का नाम लेकर ज़ोर से पुकारते हैं (जैसे 'ऐ ज़ैद!', 'ऐ अम्र!'), रसूलुल्लाह ﷺ को इस तरह नाम लेकर पुकारना हराम और कुफ़्र की हद तक ख़तरनाक है। उन्हें हमेशा अदब व ताज़ीम के अलक़ाब से पुकारो—जैसे 'या रसूलुल्लाह!', 'या नबिय्यल्लाह!', 'या हबीबल्लाह!'।
अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी: कुरआन ने साफ़ फ़रमा दिया कि नबी ﷺ की शान में मामूली सी भी गुस्ताख़ी या बेअदबी इंसान की ज़िंदगी भर की तमाम नेकियों (नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात) को जलाकर राख कर देती है, और इंसान को इसका एहसास भी नहीं होता। इसलिए बारगाह-ए-रिसालत का अदब ईमान की बक़ा की बुनियादी शर्त है।
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