Transliteration: (Wa in taaa'ifataani minal mu'mineena naqtataloo fa aslihoo bainahumaa; fa-im baghat ihdaahumaa 'alal ukhraa faqaatilul latee tabghee hattaa tafeee'a ilaaa amril laah; fa-in faaa'at fa aslihoo bainahumaa bil'adli wa aqsitoo, innal laaha yuhibbul muqsiteen)
"और अगर मोमिनों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें [20], तो उनके दरमियान सुलह करा दो [21]। फिर अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर ज़्यादती करे, तो उस ज़्यादती करने वाले से लड़ो [22] यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ लौट आए। फिर अगर वह लौट आए, तो उनके दरमियान इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करा दो और अदल करो [23]। बेशक अल्लाह इंसाफ़ करने वालों से मोहब्बत फ़रमाता है [24]!"
इस आयत से अहले-सुन्नत का यह बुनियादी अक़ीदा साबित होता है कि गुनाह या आपसी जंग से मोमिन दायरे-इस्लाम से बाहर नहीं निकलता। अल्लाह ने लड़ाई के बावजूद दोनों गिरोहों को 'मोमिनीन' (ईमान वाले) फ़रमाया।
हुज़ूर अकरम ﷺ ने हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में फ़रमाया था: "मेरा यह बेटा सरदार है, और इसके ज़रिए अल्लाह मुसलमानों के दो अज़ीम गिरोहों में सुलह कराएगा।" यह पेशीनगोई हज़रत अली मुर्तज़ा और हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हुमा के मुआमले में पूरी हुई। हज़रत अमीर मुआविया की तरफ़ से मुख़ालिफ़त इज्तिहादी थी, बग़ावत या कुफ़्र नहीं था; दोनों तरफ़ सहाबा किराम थे।
हुज़ूर ﷺ एक मर्तबा सवारी पर गुज़रे तो मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई ने बेअदबी दिखाई जिस पर हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रज़ियल्लाहु अन्हु ने उसे जवाब दिया और दोनों तरफ़ के लोगों में कहा-सुनी हो गई। हुज़ूर ﷺ ने बीच-बचाव करके सुलह करा दी। मुसलमानों के बीच सुलह कराना सुन्नत-ए-नबवी और अज़ीम इबादत है।
अगर एक फ़रीक़ सुलह न माने और ज़ुल्म पर अड़ा रहे, तो बाक़ी मुसलमानों पर लाज़िम है कि मज़लूम का साथ दें और ज़ालिम को रोकें ताकि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ लौट आए।
जब बागी गिरोह ज़ुल्म छोड़ दे, तो फिर पुरानी दुश्मनी या बदला लेने की इजाज़त नहीं, बल्कि पूरी निष्पक्षता और इंसाफ़ के साथ उनके मामलात तय किए जाएँ।
अहले-बग़ावत के ख़िलाफ़ लड़ाई आम जिहाद की तरह नहीं होती:
जैसा कि जंगे जमल में हज़रत मौला अली कर्रमल्लाहु वज्हहुल करीम ने उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा की पूरी ताज़ीम व इज़्ज़त की और उन्हें बा-वक़ार तरीक़े से मदीना मुनव्वरा पहुँचाया। इसी तरह हज़रत अमीर मुआविया ने हज़रत अक़ील (हज़रत अली के भाई) का पूरा एहतिराम फ़रमाया।
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