कुरान - 17:11 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

11
وَيَدۡعُ ٱلۡإِنسَٰنُ بِٱلشَّرِّ دُعَآءَهُۥ بِٱلۡخَيۡرِۖ وَكَانَ ٱلۡإِنسَٰنُ عَجُولٗا

Transliteration: (Wa yad'ul insaanu bishsharri du'aaa 'ahoo bilkhayr; wa kaanal insaanu 'ajoola)

और आदमी बुराई की दुआ माँगता है [30] जैसे भलाई की दुआ माँगता है, और आदमी बड़ा जल्दबाज़ है [31]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 11 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-इसरा (बनी इस्राईल) – आयत 11 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

  1. और आदमी बुराई की दुआ माँगता है [30] जैसे भलाई की दुआ माँगता है, और आदमी बड़ा जल्दबाज़ है [31]।

[30] "आदमी बुराई की दुआ माँगता है जैसे भलाई की दुआ माँगता है"

  • यह इन्सान की जज़्बाती और उतावली फ़ितरत की तरफ़ इशारा है। बाज़ औक़ात झुँझलाहट, नादानी या जल्दबाज़ी में इन्सान अंजाम को सोचे-समझे बिना अपने या अपनों के हक़ में नुक़सानदेह बद-दुआ कर बैठता है।

    मिसाल के तौर पर ग़ुस्से या रंज की हालत में इन्सान कह बैठता है:
    "मुझे मौत आ जाए!" या "फ़लाँ बर्बाद हो जाए!" — यह जाने बिना कि अगर यह दुआ क़ुबूल हो गई तो क्या मुसीबत आ पड़ेगी।

  • अल्लाह तआला अपनी बेपनाह रहमत व करम से कमज़ोरी या नादानी के लम्हों में माँगी गई ऐसी नुक़सानदेह बद-दुआओं को फ़ौरन क़ुबूल नहीं फ़रमाता।

[31] "आदमी बड़ा जल्दबाज़ है"

  • इन्सान फ़ितरी तौर पर बे-सब्र और जल्दबाज़ होता है, और हर काम का नतीजा फ़ौरन देखना चाहता है।

  • यह आयत ग़ौर व फ़िक्र, सब्र और अल्लाह तआला की हिकमत पर कामिल भरोसे की अहमियत सिखाती है। जिसे हम फ़ौरी तौर पर "भलाई" समझते हैं उसमें नुक़सान हो सकता है, और जिस चीज़ से हम "बुराई" समझकर घबराते हैं उसमें अल्लाह की बड़ी नेमतें और मस्लेहतें पोशीदा हो सकती हैं।

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