Transliteration: (Wa ja'alnal laila wannahaara Aayatayni famahawnaaa Aayatal laili wa ja'alnaaa Aayatan nahaari mubsiratal litabtaghoo fadlam mir Rabbikum wa lita'lamoo 'adadas sineena walhisaab; wa kulla shai'in fassalnaahu tafseelaa)
"और हमने रात और दिन को दो निशानियाँ बनाया [32], फिर रात की निशानी को हमने मिटाया और दिन की निशानी को रौशन किया [33], ताकि तुम अपने रब का फ़ज़्ल तलाश करो [34] और इसलिए कि तुम बरसों की गिनती और हिसाब जानो [35]। और हमने हर चीज़ को ख़ूब खोलकर तफ़सील से बयान फ़रमा दिया है [36]।"
चूँकि रात दिन से पहले आती है, इसलिए पहले रात का ज़िक्र हुआ और फिर दिन का; यानी रात और दिन का आना-जाना, उनकी मुद्दत का घटना और बढ़ना, और सर्दी व गर्मी की तब्दीली इस हक़ीक़त को ज़ाहिर करती है कि वक़्त ख़ुद कुछ नहीं कर रहा बल्कि एक क़ादिर-ए-मुतलक़ ज़ात है जो इस वक़्त को बदल और चला रही है।
इसका मतलब यह है कि अल्लाह तआला ने रात के लिए अँधेरा और दिन के लिए उजाला पैदा फ़रमाया ताकि तुम रात में आराम हासिल कर सको और दिन में काम-काज कर सको। याद रखो कि नींद जिस्म को आराम देती है और तहज्जुद की नमाज़ रूह को सुकून व राहत बख़्शती है।
इससे दो अहम बातें मालूम होती हैं:
काम-काज छोड़कर बेकार और निठल्ले बैठे रहना गुनाह है। अल्लाह तआला ने काम करने के लिए हाथ-पाँव अता फ़रमाए हैं — उन्हें बेकार न करो, बल्कि उन्हें हलाल मेहनत में लगाओ। दिन को रौशनी इसी लिए दी गई है ताकि तुम उसमें अपनी रोज़ी कमा सको।
रिज़्क़ हक़ीक़त में अल्लाह तआला का फ़ज़्ल है, सिर्फ़ हमारी मेहनत और काबिलियत का नतीजा नहीं है। इसलिए अपने हुनर पर घमंड न करो, बल्कि हमेशा अल्लाह तआला का फ़ज़्ल तलाश करो।
रात और दिन की गर्दिश ही की बदौलत हमारे पास मिनट, घंटे, पहर, तारीख़ें, महीने, साल और सदियाँ वजूद में आती हैं, जिनके ज़रिए हम हर चीज़ की उम्र और मुद्दत का सही हिसाब और रिकॉर्ड महफ़ूज़ रख पाते हैं।
इससे मुराद यह है कि अल्लाह तआला ने हर चीज़ का मुकम्मल और तफ़सीली बयान क़ुरआन-ए-पाक या लौह-ए-महफ़ूज़ में रख दिया है। चुनाँचे जिन मक़बूल बन्दों की नज़र इन पर होती है, उन्हें हर चीज़ का कामिल इल्म हासिल होता है।
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