कुरान - 17:33 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
وَلَا تَقۡتُلُواْ ٱلنَّفۡسَ ٱلَّتِي حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلۡحَقِّۗ وَمَن قُتِلَ مَظۡلُومٗا فَقَدۡ جَعَلۡنَا لِوَلِيِّهِۦ سُلۡطَٰنٗا فَلَا يُسۡرِف فِّي ٱلۡقَتۡلِۖ إِنَّهُۥ كَانَ مَنصُورٗا

Transliteration: (Wa laa taqtulun nafsal latee harramal laahu illaa bilhaqq; wa man qutila mazlooman faqad ja'alnaa liwaliyyihee sultaanan falaa yusrif fil qatli innahoo kaana mansooraa)

और किसी ऐसे जीव (इंसान) की हत्या न करो जिसे अल्लाह ने सम्मानित (हराम) ठहराया है, सिवाय हक़ (न्यायपूर्ण क़ानून) के। और जो कोई अन्यायपूर्वक (नाहक़) मार डाला जाए, तो हमने उसके उत्तराधिकारी (वारिस) को अधिकार दिया है, परन्तु वह हत्या में सीमा का उल्लंघन न करे; निश्चय ही उसकी सहायता की गई है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अल-इस्रा – आयत 33 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] मानव जीवन की पवित्रता और क़िसास का क़ानून

किसी निर्दोष इंसान की जान लेना पूरी मानवता की हत्या के समान है। केवल शरीअत और अदालत के क़ानून (जैसे जानबूझकर क़त्ल के बदले क़िसास या विवाहित व्यभिचारी की सज़ा) के तहत ही जान ली जा सकती है। मज़लूम के वारिस को बदला लेने या माफ़ करने का हक़ है, मगर उसे भी न्याय की सीमा में रहना होगा।

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