कुरान - 45:14 सूरह अल-जासिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
قُل لِّلَّذِينَ ءَامَنُواْ يَغۡفِرُواْ لِلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ أَيَّامَ ٱللَّهِ لِيَجۡزِيَ قَوۡمَۢا بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ

Transliteration: (Qul lillazeena aamanoo yaghfiroo lillazeena laa yarjoona ayyaamal laahi liyajziya qawmam bimaa kaanoo yaksiboon)

ईमान वालों से फ़रमा दीजिए कि वे उन लोगों को माफ़ कर दें (दरगुज़र करें) जो अल्लाह के दिनों [24] का ख़ौफ़ नहीं रखते, ताकि वह उस क़ौम को उनकी कमाई का बदला [25] दे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-जासिया आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-जासिया तफ़सीर - आयत 14

"ईमान वालों से फ़रमा दीजिए कि वे उन लोगों को माफ़ कर दें (दरगुज़र करें) जो अल्लाह के दिनों [24] का ख़ौफ़ नहीं रखते, ताकि वह उस क़ौम को उनकी कमाई का बदला [25] दे।"

[24] इब्तिदाई दौर में अफ़्व-ओ-दरगुज़र का हुक्म

यह हुक्म इस्लाम के इब्तिदाई मक्की दौर में दिया गया था जब जिहाद की इजाज़त नहीं हुई थी। मुसलमानों को हुक्म था कि वे काफ़िरों की ज़्यादतियों और तकलीफ़ों पर सब्र और दरगुज़र से काम लें।

‘अल्लाह के दिनों’ से मुराद वह दिन हैं जब पिछली सरकश क़ौमों (जैसे क़ौम-ए-आद व समूद) पर अज़ाब आया था, या क़ियामत का दिन जब हर मुजरिम को सज़ा मिलेगी।

[25] आमाल का बदला तयशुदा है

अल्लाह तआला ज़ालिमों की हर हरकत से बा-ख़बर है और वह उन्हें उनकी बदआमालियों का पूरा बदला देगा। बाद में जिहाद की आयतों ने क़िताल के अहकाम को नाफ़िज़ फ़रमाया, लेकिन सब्र और हिल्म का यह उसूल अपनी जगह एक अज़ीम सिफ़त है।

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