Transliteration: (Qul lillazeena aamanoo yaghfiroo lillazeena laa yarjoona ayyaamal laahi liyajziya qawmam bimaa kaanoo yaksiboon)
"ईमान वालों से फ़रमा दीजिए कि वे उन लोगों को माफ़ कर दें (दरगुज़र करें) जो अल्लाह के दिनों [24] का ख़ौफ़ नहीं रखते, ताकि वह उस क़ौम को उनकी कमाई का बदला [25] दे।"
यह हुक्म इस्लाम के इब्तिदाई मक्की दौर में दिया गया था जब जिहाद की इजाज़त नहीं हुई थी। मुसलमानों को हुक्म था कि वे काफ़िरों की ज़्यादतियों और तकलीफ़ों पर सब्र और दरगुज़र से काम लें।
‘अल्लाह के दिनों’ से मुराद वह दिन हैं जब पिछली सरकश क़ौमों (जैसे क़ौम-ए-आद व समूद) पर अज़ाब आया था, या क़ियामत का दिन जब हर मुजरिम को सज़ा मिलेगी।
अल्लाह तआला ज़ालिमों की हर हरकत से बा-ख़बर है और वह उन्हें उनकी बदआमालियों का पूरा बदला देगा। बाद में जिहाद की आयतों ने क़िताल के अहकाम को नाफ़िज़ फ़रमाया, लेकिन सब्र और हिल्म का यह उसूल अपनी जगह एक अज़ीम सिफ़त है।
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