Transliteration: (Wa aatainaahum baiyinaatim minal amri famakh talafooo illaa mim ba'di maa jaaa'ahumul 'ilmu baghyam bainahum; inna Rabbaka yaqdee bainahum Yawmal Qiyaamati feemaa kaanoo feehi yakhtalifoon)
"और हमने उन्हें इस अम्र (दीन) के मुताअल्लिक़ रौशन दलीलें [32] दीं, तो उन्होंने इल्म आ जाने के बाद सिर्फ़ आपस की ज़िद और हसद [34] की वजह से इख़्तिलाफ़ [33] किया। बेशक आपका रब क़ियामत के दिन उनके दरमियान उस बात का फ़ैसला फ़रमाएगा जिसमें वे इख़्तिलाफ़ करते थे [35]।"
तौरात और इंजील में हुज़ूर अकरम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की आमद, आपकी सिफ़ात और अलामात पूरी वज़ाहत के साथ दर्ज थीं, जिससे उनके अहले-इल्म बख़ूबी वाक़िफ़ थे।
हुज़ूर ﷺ की आमद से पहले वे मुशरिकीन के मुक़ाबले में आपकी ज़ात के वसीले से फ़तह की दुआएं मांगते थे, मगर जब आप तशरीफ़ ले आए तो उन्होंने हसद की बिना पर इनकार कर दिया।
इल्म इख़्तिलाफ़ मिटाने के लिए आता है, लेकिन जब आलिम के दिल में हसद और बुग़ज़ आ जाए तो वही इल्म फ़साद का ज़रिया बन जाता है। इब्लीस भी बा-इल्म था, मगर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से हसद ने उसे हमेशा के लिए मरदूद बना दिया।
अगरचे दुनिया में हुक्म आ चुका है, लेकिन हक़ीक़ी और अमली फ़ैसला—जिसमें हक़ वालों को जन्नत और बातिल वालों को दोज़ख़ में डाला जाएगा—क़ियामत के दिन होगा जिसे यौमुल फ़स्ल कहा गया है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat