Transliteration: (Innahum lany yughnoo 'anka minal laahi shai'aa; wa innaz zaalimeena ba'duhum awliyaaa'u ba'dinw wallaahu waliyyul muttaqeen)
"बेशक वे अल्लाह के मुक़ाबले में आपके कुछ काम न आ सकेंगे [38]। और बेशक ज़ालिम लोग ही एक-दूसरे के यार-ओ-मददगार [39] होते हैं, और परहेज़गारों का मददगार [40] सिर्फ़ अल्लाह है।"
अगरचे ख़िताब हुज़ूर ﷺ से है, मगर तालीम उम्मत के लिए है कि काफ़िरों की दौलत और ताक़त से अहले-ईमान कभी न घबराएं, क्योंकि वे अल्लाह के मुक़ाबले में किसी को कोई नफ़ा या नुक़सान नहीं पहुँचा सकते।
काफ़िरों की आपस की दोस्ती महज़ दुनियावी ग़रज़ पर मबनी होती है। क़ियामत के दिन यह दोस्ती दुश्मनी में बदल जाएगी, जैसा कि फ़रमाया: “उस दिन गहरे दोस्त एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे सिवाए परहेज़गारों के” (सूरह ज़ुख़रुफ़ 43:67)। काफ़िर कभी मोमिन का सच्चा दोस्त नहीं हो सकता।
दुनिया में, मौत के वक़्त और क़ियामत के दिन अल्लाह तआला ही परहेज़गारों का हक़ीक़ी वली और मददगार है, और उसके हुक्म से उसके फ़रिश्ते और मक़बूल बंदे भी मोमिनों के मुहाफ़िज़ व मददगार होते हैं।
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