Transliteration: (Am hasibal lazeenaj tarahus saiyiaati an naj'alahum kallazeena aamanoo wa 'amilu saalihaati sawaaa'am mahyaahum wa mamaatuhum; saaa'a maa yahkumoon (section 2))
"क्या वे लोग जिन्होंने गुनाहों का इर्तेकाब किया यह गुमान करते हैं कि हम उन्हें उन लोगों के बराबर [42] कर देंगे जो ईमान लाए और जिन्होंने नेक आमाल किए, कि उनका जीना और मरना बराबर हो जाए [43]? कितना बुरा फ़ैसला करते हैं!"
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि क्या कुफ़्र और गुनाह करने वाले यह ख़याल करते हैं कि उनका अंजाम बा-ईमान और नेकोकार बंदों जैसा होगा? हरगिज़ नहीं! अल्लाह की बारगाह में मोमिन और काफ़िर, मुत्तक़ी और फ़ासिक़ कभी बराबर नहीं हो सकते।
इससे यह अज़ीम अक़ीदा भी साबित हुआ कि अगर किसी मोमिन से कोई गुनाह सरज़द भी हो जाए, तब भी उसका ईमान बर्बाद नहीं होता और वह काफ़िरों की तरह नहीं बनता। गुनाहगार मोमिन की नजात आख़िरकार हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत और अल्लाह की रहमत से मुक़द्दर है।
मोमिन की ज़िंदगी अल्लाह की याद और फ़रमांबरदारी में बसर होती है, जबकि काफ़िर की ज़िंदगी ग़फ़लत और गुनाहों में। इसी तरह मौत के वक़्त और क़ब्र में भी दोनों बराबर नहीं:
मोमिन की क़ब्र जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बन जाती है और अंबिया व औलिया अपनी क़ब्रों में हक़ीक़ी तौर पर ज़िंदा होते हैं।
जबकि काफ़िर की क़ब्र जहन्नम का एक गढ़ा होती है जहाँ उस पर हमेशा अज़ाब मुसल्लत रहता है।
यह गुमान करना कि दोनों का जीना और मरना एक जैसा होगा, सरासर बातिल और बुरा फ़ैसला है।
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