Transliteration: (Afara'ayta manit takhaza ilaahahoo hawaahu wa adal lahul laahu 'alaa 'ilminw wa khatama 'alaa sam'ihee wa qalbihee wa ja'ala 'alaa basarihee ghishaawatan famany yahdeehi mim ba'dil laah; afalaa tazakkaroon)
"भला देखिए तो उस शख़्स को जिसने अपनी ख़्वाहिश [47] को अपना माबूद बना लिया, और अल्लाह ने उसे इल्म के बावजूद गुमराह [48] छोड़ दिया, और उसके कान और उसके दिल पर मोहर लगा दी, और उसकी आँखों पर पर्दा [49] डाल दिया! तो अल्लाह के बाद उसे कौन हिदायत दे सकता है? क्या तुम नसीहत नहीं पकड़ते [50]?"
मुशरिकीन-ए-मक्का जब किसी ख़ूबसूरत पत्थर को देखते तो अपने पुराने बुत को फेंक कर नए पत्थर की पूजा करने लगते थे। यह इस बात का खुला सुबूत है कि वे दरहक़ीक़त किसी ख़ुदा की नहीं बल्कि अपनी ख़्वाहिशात और नफ़्स की परस्तिश कर रहे थे। आज भी जो शख़्स शरीअत के अहकाम को छोड़कर अपने नफ़्स की पैरवी करता है, वह इसी बीमारी में मुब्तला है।
यहाँ ‘इल्म’ से या तो अल्लाह का इल्म मुराद है कि अल्लाह जानता था कि यह शख़्स हिदायत के क़ाबिल नहीं; या इंसान का अपना इल्म मुराद है कि हक़ को जान लेने के बावजूद उसने ज़िद और सरकशी से गुमराही को चुना। इससे साबित हुआ कि अल्लाह के फ़ज़्ल के बिना महज़ इल्म और अक़्ल इंसान को नजात नहीं दिला सकते; सच्ची हिदायत अल्लाह की अता है।
हुज़ूर अकरम ﷺ से बुग़ज़, कुफ़्र और बदआमालियों की नहूसत के सबब अल्लाह ने उनके दिलों, कानों और आँखों पर मोहर लगा दी, जिससे वे हक़ सुनने, देखने और समझने से महरूम हो गए।
जो शख़्स आख़िरत की हिदायत से महरूम हो गया, वह दुनिया में भी हक़ीक़ी सुकून और रहमत से ख़ाली हाथ रहा।
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