Transliteration: (Wa qaaloo maa hiya illaa hayaatunad dunyaa namootu wa nahyaa wa maa yuhlikunaaa illad dahr; wa maa lahum bizaalika min 'ilmin in hum illaayazunnoon)
"और वे कहते हैं [51]: 'हमारी ज़िंदगी तो बस यही दुनिया की ज़िंदगी है, हम यहीं मरते हैं और जीते हैं, और हमें सिर्फ़ ज़माना [52] ही हलाक करता है'। हालाँकि उन्हें इसका कोई इल्म नहीं; वे महज़ गुमान [53] दौड़ाते हैं।"
यह उन काफ़िरों का ज़िक्र है जो अल्लाह तआला के वजूद ही के मुनकिर हैं, जिन्हें ‘दह्रिया’ (Atheists/Materialists) कहा जाता है। आज भी माद्दापरस्त लोग यही कहते हैं कि ज़िंदगी और मौत महज़ क़ुदरती अमल है, इसका कोई ख़ालिक़ नहीं।
वे मौत और फ़ना को अल्लाह के हुक्म के बजाय ‘ज़माना’ (वक़्त की गर्दिश) की तरफ़ मंसूब करते थे। हदीस-ए-पाक में हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: “ज़माने को बुरा मत कहो, क्योंकि ज़माने को बदलने और चलाने वाला अल्लाह तआला ही है”। ज़िंदगी और मौत ज़माने के हाथ में नहीं बल्कि अल्लाह के क़ब्ज़े में है।
उनका यह दावा किसी दलील या वह्य पर मबनी नहीं बल्कि महज़ उनकी अपनी जिहालत और ख़ाम ख़याली है। मुक़द्दस नबियों के पैग़ाम को झुठलाकर कायनात की अज़ीम हक़ीक़तों को महज़ इत्तिफ़ाक़ क़रार देना सबसे बड़ी अक़्ली पस्ती है।
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