Transliteration: (Wa izaa tutlaa 'alaihim aayaatuna baiyinaatim maa kaana hujjatahum illaaa an qaalu'too bi aabaaa'inaaa in kuntum saadiqeen)
"और जब उनके सामने हमारी रौशन आयतें पढ़ी जाती हैं [54], तो उनकी हुज्जत इसके सिवा कुछ नहीं होती कि वे कहते हैं: 'हमारे बाप-दादाओं को ज़िंदा कर लाओ [55], अगर तुम सच्चे हो'।"
क़ुरआन-ए-पाक की आयतें मरने के बाद दोबारा उठाए जाने की ऐसी रौशन और अक़्ली दलीलें पेश करती हैं जिनका कोई मुनकिर जवाब नहीं दे सकता।
लाजवाब होकर वे मज़ाक़ के तौर पर यह मुतालबा करते थे कि अगर दोबारा ज़िंदा होना सच है तो हमारे मरे हुए पुरखों को अभी ज़िंदा करके दिखाओ। यह उनका तकब्बुर था, क्योंकि क़ियामत अपने मुक़र्ररा वक़्त पर आएगी, किसी काफ़िर की ज़िद पर नहीं।
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