कुरान - 45:22 सूरह अल-जासिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

22
وَخَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ بِٱلۡحَقِّ وَلِتُجۡزَىٰ كُلُّ نَفۡسِۭ بِمَا كَسَبَتۡ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa khalaqal laahus samaawaati wal arda bilhaqqi wa litujzaa kullu nafsim bimaa kasabat wa hum laa yuzlamoon)

और अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को हक़ के साथ [44] पैदा फ़रमाया, ताकि हर जान को उसकी कमाई का बदला [45] दिया जाए और उन पर कोई ज़ुल्म न हो [46]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-जासिया आयत 22 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-जासिया तफ़सीर - आयत 22

"और अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को हक़ के साथ [44] पैदा फ़रमाया, ताकि हर जान को उसकी कमाई का बदला [45] दिया जाए और उन पर कोई ज़ुल्म न हो [46]।"

[44] तख़लीक़-ए-कायनात में मर्तबों का फ़र्क़

अल्लाह तआला ने पूरी कायनात को हिकमत और हक़ के साथ बनाया है। जिस तरह कायनात की हर चीज़ में दर्जा-ब-दर्जा फ़र्क़ है—काबा शरीफ़ की ज़मीन तमाम ज़मीनों से अफ़ज़ल है, मस्जिद की जगह पाक है जबकि गंदी जगह नापाक है—तो फिर इंसानियत में मोमिन और काफ़िर कैसे बराबर हो सकते हैं? जो लोग नबियों को अपने जैसा आम इंसान समझते हैं, उन्हें इस फ़र्क़ पर ग़ौर करना चाहिए।

[45] जज़ा और सज़ा का इलाही मक़सद

कायनात की तख़लीक़ का अज़ीम मक़सद यह है कि क़ियामत के दिन हर इंसान को उसके आमाल का पूरा-पूरा बदला मिले। अगर हिसाब-किताब का दिन न होता तो ज़ालिम और मज़लूम का कोई फ़ैसला न हो पाता।

[46] इंसाफ़-ए-इलाही और अदम-ए-ज़ुल्म

किसी पर ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा—न किसी गुनहगार की सज़ा बे-वजह बढ़ाई जाएगी और न ही किसी नेकोकार के सवाब में कमी की जाएगी। अल्लाह की तरफ़ से गुनाहों की मुआफ़ी और नेकियों पर बेहिसाब अता उसका ख़ालिस फ़ज़्ल व करम है।

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