Transliteration: (Summa ja'alnaaka 'alaa sharee'atim minal amri fattabi'haa wa laa tattabi'ahwaaa'al-lazeena laa ya'lamoon)
"फिर हमने आपको दीन के एक रौशन और सीधे रास्ते [36] पर क़ायम फ़रमाया, तो आप उसी पर चलिए, और उन नादानों की ख़्वाहिशात [37] के पीछे न चलिए।"
‘शरीअत’ उस खुले, वाज़ेह और सीधे रास्ते को कहते हैं जो इंसान को सीधे उसकी मंज़िल-ए-मक़सूद तक पहुँचा दे। अल्लाह तआला ने बनी इसराईल के बाद हुज़ूर अकरम ﷺ को सबसे मुकम्मल, रौशन और जामेअ शरीअत अता फ़रमाई। हुज़ूर ﷺ इस राह के नाख़ुदा और रहबर हैं और उम्मत को इसी रास्ते पर चलने का हुक्म है।
काफ़िरों और मुशरिकीन की बेतुकी रायों और मनघड़ंत ख़्वाहिशात की पैरवी से सख़्ती से मना फ़रमाया गया, क्योंकि दीन में सिर्फ़ वह्य-ए-इलाही और सुन्नत-ए-रसूल ही मुअतबर है।
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