कुरान - 45:18 सूरह अल-जासिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

18
ثُمَّ جَعَلۡنَٰكَ عَلَىٰ شَرِيعَةٖ مِّنَ ٱلۡأَمۡرِ فَٱتَّبِعۡهَا وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Summa ja'alnaaka 'alaa sharee'atim minal amri fattabi'haa wa laa tattabi'ahwaaa'al-lazeena laa ya'lamoon)

फिर हमने आपको दीन के एक रौशन और सीधे रास्ते [36] पर क़ायम फ़रमाया, तो आप उसी पर चलिए, और उन नादानों की ख़्वाहिशात [37] के पीछे न चलिए। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-जासिया आयत 18 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-जासिया तफ़सीर - आयत 18

"फिर हमने आपको दीन के एक रौशन और सीधे रास्ते [36] पर क़ायम फ़रमाया, तो आप उसी पर चलिए, और उन नादानों की ख़्वाहिशात [37] के पीछे न चलिए।"

[36] शरीअत-ए-मुहम्मदिया का रौशन रास्ता

‘शरीअत’ उस खुले, वाज़ेह और सीधे रास्ते को कहते हैं जो इंसान को सीधे उसकी मंज़िल-ए-मक़सूद तक पहुँचा दे। अल्लाह तआला ने बनी इसराईल के बाद हुज़ूर अकरम ﷺ को सबसे मुकम्मल, रौशन और जामेअ शरीअत अता फ़रमाई। हुज़ूर ﷺ इस राह के नाख़ुदा और रहबर हैं और उम्मत को इसी रास्ते पर चलने का हुक्म है।

[37] जाहिलों की ख़्वाहिशात का मुकम्मल रद्द

काफ़िरों और मुशरिकीन की बेतुकी रायों और मनघड़ंत ख़्वाहिशात की पैरवी से सख़्ती से मना फ़रमाया गया, क्योंकि दीन में सिर्फ़ वह्य-ए-इलाही और सुन्नत-ए-रसूल ही मुअतबर है।

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