कुरान - 45:29 सूरह अल-जासिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
هَٰذَا كِتَٰبُنَا يَنطِقُ عَلَيۡكُم بِٱلۡحَقِّۚ إِنَّا كُنَّا نَسۡتَنسِخُ مَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Haazaa kitaabunaa yantiqu 'alaikum bilhaqq; innaa kunnaa nastansikhu maa kuntum ta'maloon)

यह हमारा लिखा हुआ (दफ़्तर) है जो तुम्हारे ख़िलाफ़ हक़ के साथ बोल रहा है; बेशक हम लिखवा रहे थे [62] जो कुछ तुम कर रहे थे [63]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-जासिया आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-जासिया तफ़सीर - आयत 29

"यह हमारा लिखा हुआ (दफ़्तर) है जो तुम्हारे ख़िलाफ़ हक़ के साथ बोल रहा है; बेशक हम लिखवा रहे थे [62] जो कुछ तुम कर रहे थे [63]।"

[62] आमाल के लिखने को अपनी तरफ़ मंसूब फ़रमाना

अगरचे आमाल लिखने का काम किरातन कातिबीन (फ़रिश्ते) अंजाम देते हैं, मगर अल्लाह ने फ़रमाया “हम लिखवा रहे थे”—क्योंकि फ़रिश्ते उसी के हुक्म और निगरानी में लिखते हैं। इसी तरह जब अल्लाह के हुक्म से नबियों के हाथों मोजिज़ात ज़ाहिर होते हैं (जैसे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का मुर्दों को ज़िंदा करना), तो वे काम भी अल्लाह के इज़्न से होते हैं।

[63] हर छोटे-बड़े अमल का रिकॉर्ड

इंसान की हर हरकत, बात और नीयत महफ़ूज़ कर ली गई है। काफ़िरों की नेकियाँ कुफ़्र की वजह से ज़ाया हो जाती हैं, जबकि मोमिनीन का ईमान, इश्क़-ए-इलाही और रूहानी अहवाल उन्हें बारगाह-ए-क़ुर्ब में आला दरजात अता करते हैं।

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