Transliteration: (Wakhtilaafil laili wannahaari wa maaa anzalal laahu minas samaaa'i mir rizqin fa ahyaa bihil arda ba'da mawtihaa wa tasreefir riyaahi Aayaatul liqawminy ya'qiloon)
"और रात और दिन के हेर-फेर [5] में, और उस रिज़्क़ (बारिश) [6] में जिसे अल्लाह ने आसमान से उतारा, फिर उसके ज़रिए ज़मीन को उसके मुर्दा होने के बाद ज़िंदा [7] कर दिया, और हवाओं की गर्दिश [8] में समझदार क़ौम के लिए निशानियाँ हैं।"
रात और दिन का मुक़र्ररा निज़ाम के तहत एक-दूसरे के पीछे आना-जाना, कभी दिन का बड़ा होना और कभी रात का लंबा होना—यह सब अल्लाह तआला के कामिल निज़ाम और क़ुदरत की खुली दलील है।
बारिश को यहाँ ‘रिज़्क़’ फ़रमाया गया, क्योंकि बारिश ही वह बुनियादी ज़रिया है जिससे ज़मीन से इंसान और जानवरों के लिए ग़ल्ला, फल, सब्ज़ियाँ और रिज़्क़ पैदा होता है।
सूखी, बंजर और मुर्दा ज़मीन पर जब बारिश बरसती है, तो वह लहलहा उठती है। यह इस बात की रौशन दलील है कि जो ज़ात सूखी ज़मीन को ज़िंदा कर सकती है, वही ज़ात मरने के बाद इंसानों को दोबारा ज़िंदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर है।
हवाओं का कभी मशरिक़ से, कभी मग़रिब से चलना, कभी ठंडी और कभी गर्म होना, और बादलों को खींच कर ले जाना—यह सब समझदार लोगों के लिए अल्लाह की वहदानियत की अज़ीम निशानियाँ हैं।
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