Transliteration: (Tilka Aayatul laahi natloohaa 'alaika bil haqq, fabiayyi hadeesim ba'dal laahi wa Aayaatihee yu'minoon)
"ये अल्लाह की आयतें हैं जिन्हें हम आपके सामने हक़ के साथ तिलावत फ़रमाते [9] हैं। तो फिर वे अल्लाह और उसकी आयतों के बाद किस बात [10] पर ईमान लाएंगे?"
यानी ऐ महबूब! हम यह मुक़द्दस क़ुरआन आप पर नाज़िल और तिलावत फ़रमाते हैं, और आप इसे हमारे बंदों के सामने हक़ व हिदायत के साथ सुनाते हैं।
इससे यह अज़ीम अक़ीदा साबित होता है कि जो शख़्स क़ुरआन-ए-करीम और हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की ज़ात-ए-मुबारका से हिदायत न पाए, उसे कायनात के किसी दूसरे ज़रिए से हिदायत नहीं मिल सकती। क्योंकि न क़ुरआन के बाद कोई दूसरी आसमानी किताब आएगी और न हुज़ूर ﷺ के बाद कोई नया नबी आएगा—आप ही आख़िरी और कामिल ज़रिया-ए-हिदायत हैं।
इस आयत में लफ़्ज़ ‘हदीस’ से मुराद मुनकिरीन और काफ़िरों की बेबुनियाद बातें और मनघड़ंत अक़ीदे हैं, न कि हुज़ूर अकरम ﷺ की मुबारक हदीसें। यहाँ ‘आयात’ में क़ुरआन की आयतें और हुज़ूर ﷺ की ज़ात-ए-अक़दस दोनों शामिल हैं जो अल्लाह की क़ुदरत के अज़ीम मज़हर हैं।
लिहाज़ा, मुनकिरीन-ए-हदीस (चकड़ालवी फ़िरक़ा वग़ैरा) इस आयत से हदीस-ए-पाक के इनकार की दलील हरगिज़ नहीं पकड़ सकते। इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ़ क़ुरआन को माना जाए और सुन्नत-ए-रसूल ﷺ को छोड़ दिया जाए, वर्ना यह उन आयतों के ख़िलाफ़ होगा जिनमें फ़रमाया गया: “अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो” (सूरह निसा 3:132) और “और उन्हें किताब व हिकमत की तालीम देते हैं” (सूरह बक़रह 2:129)।
यह भी याद रहे कि इज्माअ़ और क़ियास भी अल्लाह की निशानियों में से हैं, जिनकी पैरवी का क़ुरआन ने हुक्म दिया है, जैसा कि फ़रमाया: “और जो मुसलमानों के रास्ते के सिवा किसी और रास्ते पर चलेगा, हम उसे उसी राह पर छोड़ देंगे और जहन्नम में झोंक देंगे” (सूरह निसा 4:115)।
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