Transliteration: (In tu'azzibhum fa innahum ibaaduka wa in taghfir lahum fa innaka Antal 'Azzezul Hakeem)
हज़रत ईसा (अ.स.) कहते हैं कि अगर अल्लाह उन्हें सज़ा देता है, तो यह उसका पूरा हक़ है, क्योंकि वे अल्लाह के बंदे हैं। इस जुमले से अल्लाह की मालिकियत और इंसानों की बंदगी का इज़हार होता है। साथ ही यह भी साफ़ है कि अल्लाह का अज़ाब कभी ज़ुल्म नहीं होता, बल्कि उसके इंसाफ़ का हिस्सा होता है।
ईसा (अ.स.) ने अपनी क़ौम के लिए माफ़ी की सीधी दुआ नहीं मांगी, बल्कि मामला अल्लाह की क़ुदरत और हिकमत पर छोड़ दिया। यह साबित करता है कि कुफ़्र पर डटे रहने वालों के लिए नबी भी सिफ़ारिश नहीं करते। अल्लाह की मग़फ़िरत और अज़मत सिर्फ उन पर लागू होती है जो ईमान और सच्चाई के रास्ते पर हों।
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