कुरान - 5:118 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

118
إِن تُعَذِّبۡهُمۡ فَإِنَّهُمۡ عِبَادُكَۖ وَإِن تَغۡفِرۡ لَهُمۡ فَإِنَّكَ أَنتَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ

Transliteration: (In tu'azzibhum fa innahum ibaaduka wa in taghfir lahum fa innaka Antal 'Azzezul Hakeem)

अगर तू उन्हें अज़ाब दे, तो वे तेरे बंदे हैं [323], और अगर तू उन्हें माफ़ कर दे, तो बेशक तू ग़ालिब (सर्वशक्तिमान) और हिकमत वाला है [324]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 118 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 118 की तफ़्सीर

✅ [323] अल्लाह का अपने बंदों पर पूरा इख़्तियार

हज़रत ईसा (अ.स.) कहते हैं कि अगर अल्लाह उन्हें सज़ा देता है, तो यह उसका पूरा हक़ है, क्योंकि वे अल्लाह के बंदे हैं। इस जुमले से अल्लाह की मालिकियत और इंसानों की बंदगी का इज़हार होता है। साथ ही यह भी साफ़ है कि अल्लाह का अज़ाब कभी ज़ुल्म नहीं होता, बल्कि उसके इंसाफ़ का हिस्सा होता है।

✅ [324] कुफ्र पर रहने वालों के लिए सिफ़ारिश नहीं

ईसा (अ.स.) ने अपनी क़ौम के लिए माफ़ी की सीधी दुआ नहीं मांगी, बल्कि मामला अल्लाह की क़ुदरत और हिकमत पर छोड़ दिया। यह साबित करता है कि कुफ़्र पर डटे रहने वालों के लिए नबी भी सिफ़ारिश नहीं करते। अल्लाह की मग़फ़िरत और अज़मत सिर्फ उन पर लागू होती है जो ईमान और सच्चाई के रास्ते पर हों।

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