Transliteration: (Fa izaa nufikha fis Soori falaaa ansaaba bainahum yawma'izinw wa laa yatasaaa'aloon)
"फिर जब सूर फूंका जाएगा, तो उस दिन न तो उनके दरमियान कोई रिश्ते-नाते रहेंगे [140] और न ही वे एक-दूसरे का हाल पूछेंगे।"
सूर फूंके जाने के वक़्त क़ियामत की दहश्त और हौलनाकी ऐसी होगी कि दुनियावी नसब और रिश्ते-नाते टूट जाएंगे। हर शख़्स को अपनी नफ़्स-नफ़्सी पड़ी होगी और कोई किसी का पुरसाने-हाल न होगा।
अलबत्ता हदीस-ए-पाक में वाज़ेह है कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ का नसब और सबब क़ियामत के दिन भी बाक़ी रहेगा। नेक औलाद, मुत्तक़ी वालिदैन और अहले-ईमान के रूहानी रिश्ते बरक़रार रहेंगे और अल्लाह के हुक्म से नेक लोग अपने प्यारों की शफ़ाअत करेंगे। कुरआन में फ़रमाया: 'अख़िल्ला (दोस्त) उस दिन एक-दूसरे के दुश्मन होंगे सिवाय परहेज़गारों के'।
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