Transliteration: (Hattaaa izaa jaaa'a ahada humul mawtu qaala Rabbir ji'oon)
"यहाँ तक कि जब उनमें से किसी को मौत [135] आ पहुंचती है, तो वह कहता है, 'ऐ मेरे रब! मुझे वापस भेज दे [136]'।"
यह आयत मुनकिर और काफ़िर की मौत के वक़्त की बेबसी को बयान करती है। उम्र भर वह हठधर्मी और इन्कार पर क़ाइम रहा, लेकिन जब मौत सामने आई और पर्दे हट गए, तो वह गिड़गिड़ाकर कहेगा: "ऐ मेरे रब! मुझे वापस दुनिया में भेज दे!"
लेकिन उस वक़्त का पछतावा कोई नफ़ा नहीं देता, क्योंकि तौबा और अमल का वक़्त ख़त्म हो चुका होता है।
सच्चा मोमिन दुनिया में वापस आने की तमन्ना नहीं करता क्योंकि वह अपने रब की मुलाक़ात का मुश्ताक़ होता है। सिर्फ़ शहीद यह तमन्ना करता है कि काश वह दुनिया में बार-बार लौटे और अल्लाह की राह में अपनी जान क़ुर्बान करे।
यहाँ अरबी में जमा का सीग़ा इस्तेमाल हुआ है जो या तो ताज़ीम के लिए है, या फिर अल्लाह के साथ-साथ उन फ़रिश्तों से ख़िताब है जो उसकी रूह क़ब्ज़ कर रहे होते हैं। लेकिन मौत के बाद वापसी का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो जाता है।
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