कुरान - 23:100 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

100
لَعَلِّيٓ أَعۡمَلُ صَٰلِحٗا فِيمَا تَرَكۡتُۚ كَلَّآۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَآئِلُهَاۖ وَمِن وَرَآئِهِم بَرۡزَخٌ إِلَىٰ يَوۡمِ يُبۡعَثُونَ

Transliteration: (La'alleee a'malu saalihan feemaa taraktu kallaa; innahaa kalimatun huwa qaaa'iluhaa wa minw waraaa'ihim barzakhun ilaa Yawmi yub'asoon)

ताकि मैं उस (दौलत व ज़िन्दगी) में कोई नेक अमल करूँ जिसे मैं छोड़ आया हूँ [137]!' हरगिज़ नहीं! यह तो बस एक बात है जो वह अपनी ज़बान से कह रहा है [138]; और उनके आगे उस दिन तक एक आड़ (बरज़ख़) है जिस दिन वे दोबारा उठाए जाएंगे [139]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 100 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 100

"ताकि मैं उस में कोई नेक अमल करूँ जिसे मैं छोड़ आया हूँ [137]! हरगिज़ नहीं! यह तो बस एक बात है जो वह अपनी ज़बान से कह रहा है [138]; और उनके आगे उस दिन तक एक आड़ है जिस दिन वे उठाए जाएंगे [139]।"

[137] मौत के बाद नेक अमल की तमन्ना

काफ़िर मौत के वक़्त तमन्ना करेगा कि काश उसे थोड़ी सी मोहलत मिल जाए ताकि वह अपने छोड़े हुए माल व ज़िन्दगी में नेक काम कर सके और ईमान ले आए। लेकिन यह तमन्ना ऐन उस वक़्त है जब अमल का वक़्त गुज़र चुका है।

[138] महज़ बेअसर ज़बानी बात

अल्लाह तआला ने फ़रमाया: 'कल्ला' (हरगिज़ नहीं!)। यह महज़ एक ज़बानी दावा है। अगर उन्हें वापस भी भेज दिया जाए, तो वे फिर वही कुफ़्र और नाफ़रमानी करेंगे जैसा कि सूरह अनआम में फ़रमाया गया।

[139] आलमे बरज़ख़ की हाइल दीवार

मौत के बाद और क़ियामत के दिन दोबारा उठाए जाने तक एक आड़ (बरज़ख़) हाइल है, जो दुनिया और आख़िरत के दरमियान का आलम है। इस आलम में इंसान अपने आमाल के मुताबिक़ जज़ा या सज़ा भुगतता है और दुनिया में वापस नहीं आ सकता।

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