कुरान - 23:109 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

109
إِنَّهُۥ كَانَ فَرِيقٞ مِّنۡ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَآ ءَامَنَّا فَٱغۡفِرۡ لَنَا وَٱرۡحَمۡنَا وَأَنتَ خَيۡرُ ٱلرَّـٰحِمِينَ

Transliteration: (Innahoo kaana fareequm min 'ibaadee yaqooloona Rabbanaaa aamannaa faghfir lanaa warhamnaa wa Anta khairur raahimeen)

बेशक मेरे बंदों में से एक गिरोह [148] (मोमिनों का) ऐसा था जो कहता था, 'ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आए, पस हमें बख़्श दे और हम पर रहम फ़रमा [149], और तू ही सबसे बेहतरीन रहम फ़रमाने वाला है;' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 109 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-मोमिनून – आयत 109

"बेशक मेरे बंदों में से एक गिरोह [148] ऐसा था जो कहता था: 'ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आए, पस हमें बख़्श दे और हम पर रहम फ़रमा [149], और तू ही सबसे बेहतरीन रहम फ़रमाने वाला है'।"

[148] आजिज़ मोमिनों का मुबारक़ गिरोह

यहाँ उन नेक और सालेह मोमिनों (सहाबा-ए-किराम और सालेहीन) का ज़िक्र है जो नेकियों के बावजूद ख़ुद को आजिज़ और ख़ताकार समझकर अल्लाह की बारगाह में मग़फ़िरत की दुआएं मांगते थे।

[149] ईमान के वसीले से मग़फ़िरत व रहमत की दुआ

उनकी दुआ का आग़ाज़ 'आसन्ना' (हम ईमान लाए) से होता था, यानी वे अपने ईमान को वसीला बनाकर मग़फ़िरत व रहमत तलब करते थे। यह सिखाता है कि ईमान सबसे अज़ीम नेअमत है जिसके वसीले से दुआएं मक़बूल होती हैं।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now