Transliteration: (Innahoo kaana fareequm min 'ibaadee yaqooloona Rabbanaaa aamannaa faghfir lanaa warhamnaa wa Anta khairur raahimeen)
"बेशक मेरे बंदों में से एक गिरोह [148] ऐसा था जो कहता था: 'ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आए, पस हमें बख़्श दे और हम पर रहम फ़रमा [149], और तू ही सबसे बेहतरीन रहम फ़रमाने वाला है'।"
यहाँ उन नेक और सालेह मोमिनों (सहाबा-ए-किराम और सालेहीन) का ज़िक्र है जो नेकियों के बावजूद ख़ुद को आजिज़ और ख़ताकार समझकर अल्लाह की बारगाह में मग़फ़िरत की दुआएं मांगते थे।
उनकी दुआ का आग़ाज़ 'आसन्ना' (हम ईमान लाए) से होता था, यानी वे अपने ईमान को वसीला बनाकर मग़फ़िरत व रहमत तलब करते थे। यह सिखाता है कि ईमान सबसे अज़ीम नेअमत है जिसके वसीले से दुआएं मक़बूल होती हैं।
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