कुरान - 23:27 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

27
فَأَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡهِ أَنِ ٱصۡنَعِ ٱلۡفُلۡكَ بِأَعۡيُنِنَا وَوَحۡيِنَا فَإِذَا جَآءَ أَمۡرُنَا وَفَارَ ٱلتَّنُّورُ فَٱسۡلُكۡ فِيهَا مِن كُلّٖ زَوۡجَيۡنِ ٱثۡنَيۡنِ وَأَهۡلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيۡهِ ٱلۡقَوۡلُ مِنۡهُمۡۖ وَلَا تُخَٰطِبۡنِي فِي ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓاْ إِنَّهُم مُّغۡرَقُونَ

Transliteration: (Fa awhainaaa ilaihi anis na'il fulka bi a'yuninaa wa wahyinaa fa izaa jaaa'a amrunaa wa faarat tannooru fasluk feehaa min kullin zawjainis naini wa ahlaka illaa man sabaqa 'alaihil qawlu minhum walaa tukhaatibnee fil lazeena zalamooo innaahum mughraqoon)

27. तो हमने उनकी तरफ़ वह्य भेजी कि हमारी निगरानी में और हमारी वह्य (हुक्म) के मुताबिक़ कश्ती बनाओ [39]; फिर जब हमारा हुक्म आ पहुंचे और तन्नूर उबल पड़े [40], तो तुम उसमें हर (जानदार) की दो क़िस्में (नर और मादा का जोड़ा) सवार कर लो, और अपने घर वालों को भी [41] सिवाय उसके जिस पर पहले से फ़ैसला हो चुका है [42]; और उन ज़ालिमों के बारे में मुझसे कोई बात न करना [43]; बेशक वे डूबो दिए जाने वाले हैं [44] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 27 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 27 की तफ़सीर

"तो हमने उनकी तरफ़ वह्य भेजी कि हमारी निगरानी में और हमारी वह्य (हुक्म) के मुताबिक़ कश्ती बनाओ [39]; फिर जब हमारा हुक्म आ पहुंचे और तन्नूर उबल पड़े [40], तो तुम उसमें हर (जानदार) की दो क़िस्में (नर और मादा का जोड़ा) सवार कर लो, और अपने घर वालों को भी [41] सिवाय उसके जिस पर पहले से फ़ैसला हो चुका है [42]; और उन ज़ालिमों के बारे में मुझसे कोई बात न करना [43]; बेशक वे डूबो दिए जाने वाले हैं [44] ।"

[39] कश्ती की तामीर: वह्य-ए-इलाही के तहत

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) दुनिया के पहले इंसान हैं जिन्होंने कश्ती बनाई। यह कश्ती किसी इंसानी ईजाद से नहीं बल्कि अल्लाह की वह्य और हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) की रहनुमाई में तैयार हुई।

[40] तन्नूर का उबलना: तूफ़ान की अलामत

कूफ़ा की मस्जिद के पास हज़रत हव्वा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का वह तन्नूर था जिससे पानी का चश्मा उबल पड़ा। यह अज़ाब और तूफ़ान शुरू होने की रब्बानी निशानी थी जिस पर कश्ती में सवार होने का हुक्म था।

[41-42] अहले ईमान की नजात और काफ़िर औलाद की महरूमी

कश्ती में हर जानदार का जोड़ा और ईमानदार घर वाले सवार किए गए। मगर हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) का बेटा (कनआन) और बीवी (वाइला) कुफ़्र की वजह से हलाक होने वालों में मुक़द्दर हो चुके थे। इससे साबित हुआ कि कुफ़्र की हालत में नबी का बेटा होना भी काम नहीं आता; नजात सिर्फ़ ईमान से मिलती है।

[43-44] ज़ालिमों के लिए शफ़ाअत की मुमानअत

अल्लाह तआला ने फ़रमा दिया कि इन ज़ालिमों के हक़ में अब कोई सिफ़ारिश न की जाए, क्योंकि उनके ग़र्क़ होने का क़तई फ़ैसला हो चुका है।

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