कुरान - 23:28 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
فَإِذَا ٱسۡتَوَيۡتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى ٱلۡفُلۡكِ فَقُلِ ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ ٱلَّذِي نَجَّىٰنَا مِنَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Fa izas tawaita anta wa mam ma'aka 'alal fulki faqulil hamdu lillaahil lazee najjaanaa minal qawmiz zalimeen)

28. फिर जब तुम और तुम्हारे साथी कश्ती पर ठीक तरह बैठ जाओ [45], तो कहो, 'सब तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं जिसने हमें ज़ालिम क़ौम से नजात दी [46] !' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 28 की तफ़सीर

"फिर जब तुम और तुम्हारे साथी कश्ती पर ठीक तरह बैठ जाओ [45], तो कहो, 'सब तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं जिसने हमें ज़ालिम क़ौम से नजात दी [46] !'"

[45] कश्ती में जानवरों की शमूलियत और काफ़िरों की ज़िल्लत

कश्ती में कुत्ते और बिल्ली जैसे जानवरों को तो पनाह मिल गई, मगर काफ़िर इंसानों को अंदर आने की इजाज़त न मिली। यह साबित करता है कि जो इंसान अल्लाह का इनकार करता है, वह जानवरों से भी बदतर दर्जे में गिर जाता है।

[46] ज़ालिमों की हलाकत पर हम्द व शुक्र

ज़ालिमों और दुश्मनाने दीन का ख़ातमा अहले ईमान के लिए रहमत और सुकून का सबब होता है। जिस तरह हुज़ूर अकरम ﷺ ने अबू जहल के मारे जाने पर सजदा-ए-शुक्र अदा किया और आशूरा के दिन फ़िरऔन के डूबने पर रोज़ा रखा, उसी तरह ज़ुल्म के ख़ात्मे पर अल्लाह की हम्द बयान करना सुन्नत है।

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