Transliteration: (Fa izas tawaita anta wa mam ma'aka 'alal fulki faqulil hamdu lillaahil lazee najjaanaa minal qawmiz zalimeen)
"फिर जब तुम और तुम्हारे साथी कश्ती पर ठीक तरह बैठ जाओ [45], तो कहो, 'सब तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं जिसने हमें ज़ालिम क़ौम से नजात दी [46] !'"
कश्ती में कुत्ते और बिल्ली जैसे जानवरों को तो पनाह मिल गई, मगर काफ़िर इंसानों को अंदर आने की इजाज़त न मिली। यह साबित करता है कि जो इंसान अल्लाह का इनकार करता है, वह जानवरों से भी बदतर दर्जे में गिर जाता है।
ज़ालिमों और दुश्मनाने दीन का ख़ातमा अहले ईमान के लिए रहमत और सुकून का सबब होता है। जिस तरह हुज़ूर अकरम ﷺ ने अबू जहल के मारे जाने पर सजदा-ए-शुक्र अदा किया और आशूरा के दिन फ़िरऔन के डूबने पर रोज़ा रखा, उसी तरह ज़ुल्म के ख़ात्मे पर अल्लाह की हम्द बयान करना सुन्नत है।
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