कुरान - 23:55 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
أَيَحۡسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِۦ مِن مَّالٖ وَبَنِينَ

Transliteration: (A-yahsaboona annnamaa numiduhum bihee mimmaalinw wa baneen)

55. क्या वे यह समझते हैं कि हम जो माल और औलाद से उनकी मदद कर रहे हैं [86]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 55 की तफ़सीर

"क्या वे यह समझते हैं कि हम जो माल और औलाद से उनकी मदद कर रहे हैं [86];"

[86] दुनियावी दौलत को रज़ा-ए-इलाही समझना: भारी भूल

काफ़िर और मुशरिक यह गुमान करते थे कि चूंकि अल्लाह ने हमें बहुत सा माल, दौलत और औलाद दी है, इसलिए अल्लाह हमसे राज़ी है और आख़िरत में भी हमारा कोई नुक़सान नहीं होगा। यह बहुत बड़ा धोखा है।

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